आत्मा में अनंत आध्यात्मिक शक्तियां हैं। कनकनंदी गुरुदेव
सागवाड़ा
ज्ञान के प्रचार प्रसार का विश्व केंद्र योगेंद्र गिरी पर विराजमान वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जितने जितने अंश में आत्मा का क्रम विकास होता है, उतने उतने अंश में आत्मा के गुण प्रकट होते हैं। जितने अंश में आत्मा के गुण प्रकट होते हैं उतने अंश में धर्म होता है। जितने जितने विभाव हैं उतना उतना अधर्म है। अनेक एटम मिलकर के बिंदु बनता है, अनेक बिंदुओं से रेखा बनती है। रेखा से अनेक आकार प्रकार बन सकते हैं। परिधि व्यास अर्थ व्यास त्रिभुज चतुर्भुज आदि। वस्त्रों के आकार प्रकार अलग-अलग होते हुए भी सभी धागे रूई से एटम से बनते हैं। वैसे ही भावो का समुच्चय ही धर्म है। जिनवाणी भेद विज्ञान के लिए है।
वटवृक्ष के हर भाग में बीज का अंश है। पंच परमेष्ठी में मूल तत्व रत्नत्रय हैं। धर्म आध्यात्मिक गुणो का समूह है जिस प्रकार व्यक्तियों का समूह समाज होता है। आत्मा में अनंत आध्यात्मिक शक्तियां हैं। भाव से जो आध्यात्मिक गुण प्रकट होते हैं वह व्यवहार धर्म हैं। हमारे अंदर अनंत शक्तियां तथा गुण भरे पड़े हुए हैं जिस प्रकार माचिस तथा तिल्ली दोनों होने पर भी अग्नि उत्पन्न नहीं होती है घर्षण करने पर ही पैदा होती है वैसे ही पूजा विधान तीर्थ यात्रा दान आत्मा में घर्षण पैदा करने के लिए है। आत्मा व धर्म का घर्षण उर्जा उत्पन्न करने के लिए है। अग्नि का संपर्क कागज जलाने में करते हैं तो ऊर्जा प्रकाश अग्नि प्रकट होती है वैसे ही पूजा तीर्थ यात्रा विधान चारों प्रकार के दान से हमारे स्वयं का भगवान जागृत होता है।
हमारे अंदर आत्मिक शक्तियां सूप्त हैं उन्हें प्रकट करने के लिए पूजा आराधना गृहस्थ धर्म श्रावक धर्म साधु धर्म आदि है। कागज तिल्ली माचिस अलग-अलग कब से हैं परंतु अग्नि उत्पन्न नहीं होती है जब घर्षण करते हैं तभी अग्नि उत्पन्न होती है वैसे ही हमारा भगवान हमारे अंदर सुप्त है उसे जागृत करने के लिए समस्त धार्मिक क्रियाएं हैं। महापुरुष दुष्ट दुर्जन पापी सबका उपकार करना चाहते हैं उद्धार करना चाहते हैं। अनंतानुबंधी कर्म अनंत काल तक कष्ट देगा। दर्शन व ज्ञान से पवित्र चरित्र वाले अपरिग्रही वितरागी मुनियों का जो चलता फिरता शरीर है उसे जिनवाणी में प्रतिमा कहा गया है। जंघम तीर्थ साधु हैं। स्थावर तीर्थ सम्मेद शिखर पावापुरी चंपापुरी योगेंद्र गिरी आदि हैं। साधु जब चलते हैं तब सब तीर्थ उनके साथ चलते हैं। साधु के गुणों को कोई एटम बम अलग नहीं कर सकते। जिनके आत्म दर्शन आत्मज्ञान आत्मचारित्र शुद्ध है उनका वीतराग विज्ञान ही जिनप्रतिमा है। साधु चलते-फिरते जीवंत तीर्थ हैं। पंच परमेष्ठी का एक भी गुण उनसे अलग नहीं हो सकता है। पूजा सामग्री जडात्मक है परंतु उसकी शुद्धि होने चाहिए। मूर्ति को देख कर मुनिराज केवल चक्षु से नहीं आत्मा से उनके गुणों का चिंतन करते हैं। मुनिराज के रूप को जिन मार्ग में दर्शन कहां है। उनके आचरण से उनके गुण प्रकट होते हैं। जिस प्रकार फूल में गंध होती है दूध में रस होता है वैसे ही मुनिराज का अंतरंग लिंग आत्म गुणों से सहित होता है आत्मा के गुणों को लिंग कहा गया है। जिनलिंग जिन स्वरूप है। जो ज्ञानमय, संयम से शुद्ध है ऐसे साधु का शरीर जिन बिंब है। जिस प्रकार दर्पण में हम हमारा प्रतिबिंब देखते हैं वैसे ही साधु का शरीर अंतरंग का प्रतिबिंब है। चतुर्थ काल में एक साधु ने अपने गुरु का नाम छुपा महावीर नाम प्रसिद्ध होने के कारण वह बता दिया जिससे उनका शरीर काला पड़ गया। पशुओं का शरीर भी नग्न रहता है परंतु साधुओं का शरीर नग्न होते हुए भी निर्ग्रंथ, मूर्तिमान गुणवान ज्ञानवान प्रतिमा मान होता है। अंतरंग सभी प्रकार के विकारों से रहित होने पर ही बाह्य नग्न होते हैं। केवल नग्न रहने से ही धर्म नहीं होता है जिस प्रकार बोर्ड पर मुंबई जाने का मार्ग तथा किलोमीटर लिखा होता है उसे पकड़ कर बैठ जाने से मुंबई नहीं पहुंच सकते हैं। साधु दृढ़ता से संयम धारण करते हैं कषाओ के वशीभूत नहीं रहते हैं यह जिनमुद्रा है। आचार्य श्री दयालु डॉक्टर की तरह हमारे दोष दूर करके हमे गुणवान ज्ञानवान बनाना चाहते हैं। एक खजाने में रत्न भरे हुए हैं उसके 9 दरवाजे हैं 8 दरवाजे बंद है तथा 1 दरवाजे खुला हैं तो चोर कभी भी चोरी कर सकते हैं वैसे ही एक दोष सभी गुणों की चोरी कर लेता है।
विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
