*वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी गुरुराज की सत्य सटीक वाणी -*
*धर्म में वास्तविक शिथलाचार क्या है??? -आडंबर,प्रदर्शन,चंदा चिट्ठा याचना,धन संग्रह,वर्चस्व के लिए भौतिक प्रपंच,प्रसिद्धि ख्याति की कामना है यही शिथलचार है जो अंतरंग तपस्या का समूल नाश करती है। सबसे आवश्यक -मूल तप अंतरंग तप ही है इसके बिना कोई भी तप त्याग सार्थक नही है।*
*धर्म आत्म दर्शन के लिए है,प्रदर्शन के लिए नही*
*धर्म की साधना आत्म सिद्धि के लिए है ,ख्याति वर्चस्व प्रसिद्धि के लिए नही*
*धर्म विश्वास से होना चाहिए विवशता से नही*
*दान स्वेच्छा से होना चाहिए दबाव से नही*
*बड़े बड़े चक्रवर्ती राजा महाराजाओ ने असीम वैभव को छोडा और मुनि बनकर जंगल के चले गए क्यों???आत्म साधना में लीन हो गए क्यों???अलौकिक – अविनाशी – आत्म वैभव को पाने,आत्म कल्याण के लिए*
*यदि धन,संपत्ति,प्रसिद्धि व प्रदर्शन से आत्म उद्धार होता तो उनके पास तो वो सब कुछ पहले से ही था अरे सैकडो हजारों राजा भी जिसके अधीन होते हैं ऐसे महाराजा चक्रवर्ती ने भी इन सब बाहरी वैभव को पूर्ण रूप से छोड़ा और वन में जाकर मुनि बनकर साधना की तब स्व आत्म को जान पाए।*

*भगवान आदिनाथ स्वामी जिनका बेटा भरत चक्रवर्ती महाराजा,बाहुबली जैसे सैकड़ों संतान,हजारों राजा जिनकी सेवा में तत्पर रहते वे भी सब कुछ छोड़कर जब मुनि बने, छह माह तक आहार विधि नही मिली तो क्या उन्होंने किसी से याचना की ???क्या इतने सारे राजा उनके एक आदेश पर सारी व्यवस्था नहीं कर सकते थे??* *लेकिन जिसका त्याग कर दिया, जिसको छोड़ दिया उसकी याचना कभी नही करी।*
*आगम में कहा गया है की साधक द्वारा धन जैसे बाहरी लौकिक वस्तुओ व प्रपंचों के लिए याचना करना अर्थात थूके हुए को चाटना,निकले हुए मल मूत्र को ग्रहण करना व वमन (उल्टी)को पीना है।*
*जो इस पवित्र वितरागी धर्म के नाम पर धन संग्रह करता है वो अपनी मां को वैश्या बनाकर बेचने के बरबार दोषी है।*
*मांगन मरण समान है,मत मांगो कोई भीख,*
*मांगन से मरना भला,यह सद्गुरु की सीख।।*
*बिना मांगे मोती मिले, मांगे मिले सो भीख*
