कड़वे प्रवचन
यह आँख बड़ी नालायक है,
किसी से लड़ जाए तो दुःख देती है,
किसी से भिड़ जाए तो दुःख देती है ।
अगर यह आ जाए (eye-flu) तो दुःख देती है
और चली जाए तो दुःख देती है।
जिन्दगी में अधिकतर गड़बड़ियां इसी आँख से शुरू होती हैं ।
तभी तो डंडे भले ही पीठ पर पढ़ें,
तो भी आँसू तो आँख को ही बहाने पड़ते हैं।
यह आँख झुक जाए तो हया बन जाती है,
उठ जाए तो दुआ बन जाती है।

आँख के बड़े कारनामे हैं। बाहर की आँख मुंदे,
इससे पहले भीतर की आँख खुल जानी चाहिए वरना
इतिहास में तुम्हारा नाम अंधों की सूची में दर्ज होगा।
क्रांतिकारी राष्ट्रसंत समाधिस्थ आचार्य जैनमुनि
श्री तरुणसागरजी महाराज
