पूज्य प्रमुख गणिनी आर्यिका 105 ज्ञानमती माताजी के 71 वें दीक्षा दिवस पर भावभीनी विन्यांजली

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पूज्य प्रमुख गणिनी आर्यिका 105 ज्ञानमती माताजी के 71 वें दीक्षा दिवस पर भावभीनी विन्यांजली

पूज्य प्रमुख गणिनी आर्यिका 105 श्री ज्ञानमती माताजी का जीवन परिचय

71वे दीक्षा दिवस चैत्र वदी एकम
8 मार्च 2023 दीक्षा दिवस पर कोटिश वंदामी

क्षु105 श्री वीरमती माताजी से गणिनी आर्यिका श्री 105 ज्ञानमती माताजी का जीवन परिचय

इनका जन्म सन 1934 की शरद पूर्णिमा के दिन हुआ शरदपूर्णिमा के उस शुभ दिन जब चन्द्रमा की शुभ्र छटा सम्पूर्ण धरा को अपने आवेश में समेटे थे, तब उ.प्र. के बाराबंकी जनपद के ग्राम टिकेतनगर में बाबू छोटेलाल जी जैन के घर एक कन्या का जन्म हुआ। कौन जानता था कि माँ मोहिनी की यह कन्या एक दिन जगत माता बनकर अपने ज्ञान के प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करेगी।

वर्तमान में जम्बूद्वीप की पावन प्रेरिका, चारित्रचन्द्रिका, विधानवाचस्पति, तीर्थोद्धारिका, वात्सल्यमूर्ति, युगप्रवर्तिका आदि दर्जनों उपाधियों से विभूषित गणिनी आर्यिकाशिरोमणि 105 श्री ज्ञानमती माताजी का जीवन अनवरत साधना एवं त्यागमय जीवन का एक अनूठा उदाहरण है।

पद्मनंदिपंचविंशतिका के स्वाध्याय के कारण बचपन से ही विकसित वैराग्य के बीज 1952 में शरदपूर्णिमा के दिन ही प्रस्फुटित हुए जब बाराबंकी में आपने आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज से सप्तम प्रतिमा (ब्रह्मचर्य) के व्रत अंगीकार किये। सन 1953 में चैत्र कृष्णा एकम् को श्री महावीर जी में आपने आचार्य श्री देशभूषण जी से क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण कर क्षुल्लिका 105 वीरमति माताजी नाम प्राप्त किया। व्रत एवं नियमों का कठोरता से पालन करते हुए आप अपनी संज्ञा ‘वीरमती’ को तो सार्थक कर ही रही थीं,

 

 

 

 

 

 

किन्तु आपको मात्र क्षुल्लिका के व्रतों से संतोष कहाँ। 19 वर्ष की यौवनावस्था में क्षुल्लिका के व्रतों का कठोरता से पालन करने के साथ ही आप निरन्तर वैराग्य के भावों को विकसित करती रहीं एवं अनन्तर इस युग के महान आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज की आज्ञा से उनके ही पट्टशिष्य आचार्यश्री 108 वीरसागर जी महाराज से वैशाख कृष्णा द्वितीया को (1956 ईसवी) माधोराजपुरा की पवित्र भूमि में आर्यिका के व्रतों को अंगीकार कर ‘ज्ञानमती’ की सार्थक संज्ञा प्राप्त की।

धन्य हैं वे भविष्य दृष्टा आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से इनकी प्रतिभा का आकलन कर इन्हें ‘‘ज्ञानमती’’ नाम दिया। आपकी उत्कृष्ट साधना एवं कठोर तपस्या का ही यह प्रभाव है कि आपके सम्पर्क में आने वाला प्रत्येक श्रावक/श्राविका आपके सम्मुख स्वयमेव नतमस्तक हो जाता है।

 

आपकी माँ मोहिनी ने भी आर्यिका श्री रत्नमती माताजी के रूप में आपके पास अनवरत साधनारत रहकर मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य‘समाधि’ (1985 में) प्राप्त की। आपकी दो बहनें आर्यिका श्री अभयमती माताजी एवं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी (संघस्थ) आपके ही पथ का अनुगमन कर रही हैं। आपके भाई कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जी (संघस्थ) भी आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत एवं सात प्रतिमा के व्रतों के पश्चात् 10 प्रतिमा धारण करके वर्तमान में जम्बूद्वीप के पीठाधीश पद को स्वीकार कर अनवरत रूप से धर्म एवं समाज की सेवा में संलग्न हैं। वे सम्प्रति दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान-हस्तिनापुर, अयोध्या दि. जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी, भगवान ऋषभदेव तपस्थली प्रयाग, अखिल भारतवर्षीय दि. जैन तीर्थंकर जन्मभूमि विकास समिति-हस्तिनापुर, भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर दि. जैन समिति कुण्डलपुर, भगवान ऋषभदेव 108 फुट उत्तुंग मूर्ति निर्माण कमेटी-मांगीतुगी आदि अनेक संस्थाओं के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

पूज्य माताजी का व्यक्तित्व
पूज्य माताजी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। जहाँ उन्होंने सम्पूर्ण भारत की पदयात्रा कर शताधिक आत्माओं में वैराग्य की ज्योति जगाई है, वहीं हस्तिनापुर में दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान के प्रबंधकों को प्रेरणा देकर जम्बूद्वीप की प्रतिकृति के रूप में न केवल जैन समाज अपितु सम्पूर्ण विश्व को एक अद्वितीय उपहार दिया है। खुले आकाश के नीचे वलयाकार लवण समुद्र से वेष्ठित १०१ फीट उत्तुंग सुमेरु के चारों ओर बनी जम्बूद्वीप की भव्य रचना कोदेखकर,तिलोयपण्णत्ति, जम्बूद्वीवपण्णत्तिसंगहो में निहित भूगोल विषयक सामग्री को सहज ही हृदयंगम किया जा सकता है। वर्तमान में ‘जम्बूद्वीप’ के नाम से विख्यात इस परिसर में स्थित कमलमंदिर, ध्यान मंदिर, त्रिमूर्ति मंदिर, सहस्रकूट जिनालय, ॐ मंदिर, भगवान वासुपूज्य मंदिर, तेरहद्वीप जिनालय , जम्बूद्वीप पुस्तकालय, विस्तृत उद्यान समग्र रूप से इसकी शोभा में अभिवृद्धि करते हैं। आपकी प्रेरणा से त्याग मार्ग पर प्रवृत्त अनेक आत्माएँ आज मुनि व आर्यिका पद को सुशोभित कर रही हैं। आपकी शिष्या कु. माधुरी आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी के रूप में एवं आपके शिष्य श्री मोतीचंद जी समाधिस्थ क्षुल्लक मोतीसागर जी के रूप में संघ में ही अध्ययन एवं साधनापथ थे । इसके अतिरिक्त वर्तमान में भी अनेक ब्रम्हचारिणी बहनें व्रत नियमों को अंगीकार कर संघ में साधनारत हैं। पूज्य माताजी को १ मई 1985 को चतुर्विध संघ के द्वारा गणिनी पद से विभूषित किया गया।

 

1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी के करकमलों से उद्घाटित जम्बूद्वीप ज्ञान ज्योति ने 4 जून 1982से 28 अप्रैल 1985 के मध्य देश में अहिंसा, शाकाहार एवं नैतिक मूल्यों के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। 1981,1982,1985 एवं 1992 में मेरठ विश्वविद्यालय एवं 1993 में अवध विश्वविद्यालय के सहयोग से पूज्य माताजी के सानिध्य में राष्ट्रीय एवं अंंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों एवं 1998 में भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन का आयोजन किया जा चुका है।

हस्तिनापुर, मांगीगतुगी के बाद आपकी दृष्टि अयोध्या पर गई ।
हस्तिनापुर के बाद आपकी दृष्टि भगवान ऋषभदेव की जन्मभूमि अयोध्या पर पड़ी। आपके मंगल पदार्पण से अयोध्या का कायाकल्प हुआ है।
वही पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि 108आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने गृहस्थ अवस्था में शुद्ध जल ग्रहण एवम् 5 वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत आपसे श्री मांगीतुगी में लिया था।
आपकी प्रेरणा से मुनि बने हैं।

 

इसी के साथ एक अविस्मरणीय क्षण है जो सदा याद किया जाता रहेगा जब


आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दर्शन करने आर्यिका माताजी बुंदेल खंड गई थी तब आचार्य श्री ने था,बड़ी बहन की संज्ञा देकर संबोधन दिया था।

आज से वर्ष बदल रहा है एक संयोग कहेंगे कि चैत्र माह से दिन प्रारंभ हो रहा है और आज महिला दिवस भी है ।आज आप समस्त साधुओं में सर्वाधिक 71 वर्ष की दीक्षित साधु,आर्यिका माताजी में से एक है

पूज्य गणिनी श्री 105 ज्ञानमती माताजी के चरणों में मेरा कोटिशः नमन
*वन्दामि वन्दामि वन्दामि माताजी 👏🏻
साभार
संकलन राजेश पंचोलिया इंदौर सनावद
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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