आचार्य श्री शिव सागर जी के 54 वे समाधि वर्ष 16 फरवरी 1969 फागुन कृष्णा अमावस्या पर जीवन परिचय

धर्म

श्री शांति वीर शिव धर्माजीत वर्द्धमान सुर्रिभ्यो नमः

आचार्य श्री शिव सागर जी के 54 वे समाधि वर्ष 16 फरवरी 1969 फागुन कृष्णा अमावस्या
पर जीवन परिचय

भारत देश में अनेक भव्य आत्माओं ने जन्म लिया है
भारत के महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद जिला जोकि अजंता एलोरा की गुफाओं के कारण प्रसिद्ध है
किंतु जैन धर्म की धार्मिक दृष्टि से देखेंगे तो अनेक दिगंबर साधु महाराष्ट्र से हुए हैं आचार्य श्री वीर सागर जी आचार्य कल्प चंद्र सागर जी आदि अनेक आचार्य और साधु महाराष्ट्र से हुए हैं

श्रीमती दगड़ा बाई श्री नेमीचंद जी रावका खंडेलवाल के यहां विक्रम संवत 1958 ग्राम अड़गांव में आपका जन्म हुआ
आपका नाम श्री हीरा लाल रखा गया
सच है यथा नाम तथा गुण
आप का लालन-पालन साधारण परिवार में हुआ किंतु आप असाधारण रहे
माता ने 2 पुत्र व दो पुत्रियों को जन्म दिया
प्लेग की बीमारी में आपके माता पिता का निधन हो गया
जब श्री हीरालाल जी की उम्र 13 वर्ष की थी तब आपके बड़े विवाहित भाई का भी निधन हो गया
निकटवर्ती ग्राम इर गांव में नाम राशि श्री हीरालाल जी गंगवाल आपके शिक्षा गुरु रहे अतिशय क्षेत्र
कचनेर स्थित श्री पार्श्व नाथ दिगंबर जैन प्राथमिक विद्यालय में आपकी लौकिक शिक्षा हुई

 

 

 

 

 

28 वर्ष की उम्र में। आपने प्रथमा चार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी के दर्शन किए और आचार्य श्री शांतिसागर जी से दो प्रतिमा के नियम व्रत धारण किए
विक्रम संवत 1999 में शिक्षा गुरु मुनि श्री वीर सागर जी महाराज से मुक्तागिरी में सात प्रतिमा के नियम लिए तथा ब्रह्मचारी बनकर संघ में प्रवेश किया

विक्रम संवत 2000 में मध्यप्रदेश के सिद्ध क्षेत्र श्री सिद्धवरकूट में बाल ब्रहमचारी श्री हीरा लाल जी ने मुनि श्री वीर सागर जी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की और क्षुल्लक श्री शिव सागर जी नामकरण हुआ
लौकिक शिक्षा गुरु हम नाम आपके आध्यात्मिक दीक्षा गुरु भी बन गए
विक्रम संवत 2006 नागौर में आपकी मुनि दीक्षा हुई और मुनि श्री वीर सागर जी ने प्रथम मुनि शिष्य के रूप में आपको मुनि दीक्षा दी

मुनि दीक्षा के बाद आचार्य श्री वीर सागर जी की समाधि तक आपने गुरुदेव का सानिध्य में ही रहे
आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की समाधि के समय आचार्य श्री वीर सागर जी को प्रथम पट्टा चार्य पद मिला आचार्य श्री वीर सागर जी की समाधि के बाद आपको मुनि श्री शिव सागर जी को विक्रम संवत 2014 कार्तिक शुक्ला 11सन 1957 को आचार्य श्री शांति सागर जी की परम्परा में दृवतीय पट्टा चार्य पद मिला

 

 

 

 

 

आचार्य श्री शिव सागर जी ने अपने साधु जीवन में

11 मुनि दीक्षा 21 आर्यिका दीक्षा एक ऐलक दीक्षा 4 क्षुल्लक दीक्षा और एक क्षुल्लिका दीक्षा कुल 38 दीक्षाये। आपके द्वारा दी गई
आपके प्रथम मुनि शिष्य मुनि श्री ज्ञान सागर जी बने

फागुन कृष्णा अमावस्या विक्रम संवत 2025 16 फरवरी सन 1969 को श्री महावीरजी अतिशय क्षेत्र पर आप की अनायास समाधि हो गई
आचार्य श्री शिव सागर जी से संबंधित कुछ संस्मरण इस प्रकार है
आचार्य श्री शिव सागर जी के सानिध्य में खानीया जी में तत्व चर्चा पूरे भारत में प्रसिद्ध रही
जब मुनि मार्गी और सोनगढ़ मार्गियों के बीच में आप के सानिध्य में में तत्व चर्चा चली यद्यपि इस चर्चा का कोई हल नहीं निकला किंतु इस तत्व चर्चा से काफी कुछ गलतफहमी भी दूर हुई
आचार्य श्री से संबंधित कुछ संस्मरण इस प्रकार है
संघ का चातुर्मास
आचार्य श्री शिव सागर जी के संध का चतुर्मास कोटा में चल रहा था एक आर्यिका माता जी के पैर में कांच का टुकड़ा चुभ गया
उससे रक्त बह निकला उन्होंने जब आचार्य श्री कोई धटना सुनाई तो आचार्य श्री ने माताजी को एक उपवास का प्रायश्चित दिया
जब किसी ने इस बारे में आचार्य श्री से पूछा कि कोई श्रावक का रक्त निकलता है तो कमजोरी दूर करने के लिए उसको उस दिन हलवा मीठा खिलाया जाता है ताकि इन वस्तुओं से उसके शरीर में खून की पूर्ति हो जाए
आचार्य श्री का उत्तर था खून कितना निकला वह महत्वपूर्ण नहीं है
महत्वपूर्ण यह है कि पेर कदम देखकर क्यों नहीं रखा अगर उस समय कुछ सूक्ष्मजीवों कि अगर विरादना होती तो वह कितना गलत होता
इस प्रकार आचार्य श्री अनुशासन में बहुत प्रिय थे एक और प्रसंग देखने में आता है कि पूजा के द्रव्यों का विवेचन करते हुए आचार्य श्री शिव सागर जी ने विश्लेषण प्रस्तुत किया कि आचार्यों ने गेहूं को पूजा की सामग्री में सम्मिलित क्यों नहीं करते
चावल को ही क्यों शामिल किया

चावल के द्वारा आचार्य श्री भक्तों को भेद विज्ञान का आभास कराते हैं
जिस प्रकार धान का छिलका और चावल अलग अलग है उसी प्रकार शरीर और आत्मा अलग-अलग है
जिस प्रकार धान का छिलका दूर किए बिना चावल के ऊपर का मेल दूर नहीं किया जा सकता है

उसी प्रकार ब्राह्य परिग्रह का त्याग किए बिना अंतरंग परिग्रह नहीं छोड़ा जा सकता है
जीवन के काफी प्रसंग हैं जो शिक्षाप्रद है
आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज की जय
संगीता राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

 

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