निर्मोही साधक आचार्य श्री
हमारे दिगंबर संत सचमुच साधना के सतत प्रहरी होते हैं जिनकी निष्काम साधना होती है। इनके भीतर अदम्य साहस होता है।
बहुत खूब किसी ने कहा है जिनकी है निष्काम साधना उनका साहस अदम्य है। हम गौर करें तो ऐसे ही हमारी गुरुवर आचार्य भगवंत विद्यासागर महाराज को यूं ही महा साधक नहीं कहा जाता यह सचमुच महा मना है। इनके जीवन में सदा साधना संयम भरा हुआ है। इन्होंने कलयुग में भी सदयुग जैसी शिष्य मंडली को तैयार किया है। आप तिरे पर तारिए ऐसे श्री मुनिराज

आचार्य श्री के यदि हम तप त्याग की सूची का वर्णन करें तो हर कोई चकित हो जाता है। जहां हम लोगों को किसी भी चीज के खाने पर स्वादहीन अगर नजर आता है तो हम विचलित हो जाते हैं लेकिन आचार्य भगवंत सचमुच इस पंचम युग में चतुर्थ युग की चर्या का उदाहरण देते हैं।

76 वर्ष की उम्र में इनके चीनी, फल, नमक, गुड़, दूध, सब्जी, चटाई, दही, हरी,तेल, सूखे मेवा (ड्राई फ्रूट्स ) 24अंजुली पानी, कम बोलना, सुनना अधिक जो उनके असाधारण व्यक्तित्व को परिलक्षित करता है।

ऐसे साधक इस धरा पर अवतरित हुए हैं यह सचमुच हमारा भारतवर्ष का संपूर्ण विश्व के लिए गौरव करने का विषय है।

हम पुण्यशाली जो ऐसे महागुरु के काल में जन्म लेने का, उनको एकटक निहारने का शुभ अवसर मिला है।
समता रस की मूरत हो
स्वात्म चिन्मूरत हो
ज्ञान ज्योति के तुम सूरज हो।
हम सभी की ज्योति हो
इस धरा के साक्षात अनमोल मोती हो।
अभिषेक जेन लुहाड़िया रामगंजमंडी
