सांसारिक मोह माया से विरक्त होकर 8 श्रावक श्राविका ने प्रसन्न सागर महाराज से ली जिनेश्वरी दीक्षा

धर्म

सांसारिक मोह माया से विरक्त होकर 8 श्रावक श्राविका ने प्रसन्न सागर महाराज से ली जिनेश्वरी दीक्षा
पारसनाथ
शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर पर साधना महोदधी आचार्य प्रसन्न सागर महाराज के कर कमलों से 8 श्रावक श्राविका को जिनेश्वरी दीक्षा प्रदान की गई। इन 8 श्रावक श्राविका ने संसार से विरक्ति का भाव लिए मुक्ति के मार्ग का अनुसरण किया।

 

 

 

 

 

इसी तारतम्य में पूज्य आचार्य श्री के द्वारा मुनि श्री पीयूष सागर महाराज को उपाध्याय पद से सुशोभित किया वह उनके दीक्षा के संस्कार संपन्न किए। समस्त आयोजन का निर्देशन पीयूष सागर महाराज व ब्रह्मचारी तरुण भैया के साथ प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप मधुर मुंबई ने किया।

 


दीक्षा विधि के प्रारंभ में समाज परिवार वह सभी संतो की अनुमति लेकर आचार्य श्री ने अपने आत्म हितंकर तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी महाराज, आचार्य शांतिसागर महाराज, आचार्य विमल सागर महाराज, आचार्य संभव सागर महाराज, आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज सहित गुरुओं की वंदना कर मंच पर आसीन चतुर्विध संघ के साथ धार्मिक क्रिया वह मंत्र उच्चारण के साथ दीक्षार्थी श्रावक श्राविका की केश लोचन की क्रिया को संपन्न किया। जब केश लोचन की क्रिया हुई तो हर कोई इसे देख भावुक नजर आया स्वयं के हाथों केशलोचन कोई सहज कार्य नहीं है वह भी बिना किसी औजार के जैन दर्शन में कैशलोच तप साधना है। केशलौच की क्रिया सम्पन्न होने के बाद आचार्य श्री के द्वारा दीक्षा के संस्कार कर आवश्यक नियमों के संकल्प दिलाकर उन्हें सन्यास के मार्ग पर आरोप करते हुए उनके नवीन नामों की घोषणा की। नामों की घोषणा होने के बाद उपस्थित समुदाय जय-जय कारों की जय घोष से गुंजायमान हो गया।
दीक्षा के बाद सभी श्रमण दीक्षार्थियो ने गुरुदेव की मंगल आशीष ली।

रोचक जानकारी

दीक्षार्थी सुशील कुमार जैन ने आचार्य श्री को शिष्य के रूप में धर्मशास्त्र का ज्ञान अध्ययन कराया था। लेकिन समय ने ऐसा प्रसंग प्रस्तुत कर दिया कि अपने शिष्य को गुरु मानते हुए उनसे दीक्षा ग्रहण की। इस विषय पर आचार्य श्री ने कहा कि सुशील जी से बहुत कुछ सीखा है।

 

इस अवसर पर बोलते हुए आचार्य श्री ने कहा कि दीक्षा स्वयं के द्वारा स्वयं की परीक्षा है। जैन संत जिह्वा से ज्यादा अपनेजीवन को प्रभावित करता है। इसीलिए भगवान महावीर ने इसे मार्ग कठिन और दुर्लभ कहा है।

उन्होंने कहा सांसारिक कई व्यक्ति साधु बन सकते हैं दिगंबर जैन संत प्रकृति का जीवन जीते हैं इसलिए नग्न रहते हैं। न स्नान, न वस्त्र, ना बर्तनों में भोजन, ना सोने को बिस्तर, ना रहने को झोपड़ी, न बैठने को गाड़ी।

 

उन्होने कहा दिगम्बर जैन संत तो 2 से 4 माह के बीच अपनेसर के बाल और दाढ़ी-मूछ को अपने हाथों से उखाड़ते है। शरीर और इन्द्रियों से ममत्व भाव कम करने के लिए और अपने वैराग्य भाव को दृढ़ करनेके लिए अपने लक्ष्य को पाने के लिए केशलोचन क्रिया करते हैं।
इन सब कार्य को आत् सात कर अपने गुरु आज्ञा का व जैन धर्म का तन मन से पालन करनेवाले ऊर्जावान व्यक्तिव जेनेश्वरी दीक्षा को प्राप्त करता है। बह्मचारी अवस्था सेक्षुल्लक दीक्षा तक नियमों में कुछ छूट होती है। जिन्हें उच्च पद मिलते ही समाप्तकर दिया जाता है। साथ ही क्षुलिका व माता जी साध्वियों के लिए भी धर्मानुसार नियम होते हैं। जिनका उन्हें पालन करना होता है।गौरतलब है कि अकल्पनीय तप साधना के मध्य भी अपने संघस्थ साधु के प्रति वात्सल्य भावका निर्वाह करते हैं।

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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