*जन्माभिषेक के कलश से संसार अच्छा होता है –मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी*
ललितपुर–
हजारों रोगो से मुक्त का एक ही उपाय है जन्म कल्याणक का अभिषेक हजारों समस्या का एक ही निदान है। जन्म जन्म की समस्त से मुक्ति का मार्ग है।पंचकल्याणक में एक मात्र क्रिया है जो भगवान के जन्माभिषेक कर सकते हैं। नारी पर्याय कही भी धन्य नहीं होती लेकिन जब नारी बालक को जन्म देकर मां बनती है। और शचि बनकर बालक तीर्थकर को सबसे पहले दर्शन करती है संसार में कोई भी इस पुण्य का मुकाबला नहीं कर सकता। जैसे ही तीर्थंकर बालक आता है तो सोधर्म इन्द्र सोचता है ऐसा तो मैंने आज तक मुद्रा कभी देखी नहीं। हजारों पंचकल्याणक करने वाले सौधर्म इन्द्र के अनुभव में भी आता। और वह अपने पूरे शरीर पर एक हजार नेत्र बनाकर उन तीर्थकर बालक को निहारते रहते हैं।
उक्त आश्य के उद्गार शाही पंचकल्याणक महोत्सव में जन्म

कल्याणक पर विराट धर्म को संबोधित करते हुए मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए दयोदय महासंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय धुर्रा ने बताया कि आज ललितपुर में परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य में चल रहे शाही पंचकल्याणक महोत्सव में भव्य विशाल जन्मभिषेक यात्रा शहर के प्रमुख मार्गों से निकली गई जहां शहर वासियों ने शौभायात्रा का अभूतपूर्व स्वागत किया करते हुए भगवान की भक्ति करते हुए नृत्य गान वैन्ड वाजे की ध्वनि से अपनी भक्ति प्रस्तुति की इस शौभायात्रा में सौधर्म इन्द्र ऐरावत हाथी पर बालक प्रभु को लेकर कुवेर इन्द्र रत्न वृष्टि करते हुए अन्य इन्द्र जय जय कार करते हुए चल रहे थे ये शौभायात्रा पाडूकशिला पर पहुंच कर जन्मभिषेक में ब एलदल गई जहां प्रभु का जन्माभिषेक भक्तों द्वारा किया गया।
जन्म से ही तीर्थ कर बालक दस अतिशय के धारी होते हैं
इसके पहले धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए मुनि पुगंव श्रीसुधासागरजी महाराज ने कहा कि अतिशय तो कुछ विशिष्ट होना चाहिए इनका छेदन भेदन नहीं हो सकता संसार का कोई व्यक्ति जन्मा हो तो अपवित्रता तो आयेगी लेकिन तीर्थकर बालक के जन्मते किसी को एक क्षण का सूतक नहीं लगता वे इतने पवित्र होते हैं सौधर्म इन्द्र की शचि सदया जात बालक को सचि लाती है नवन करतीं हैं भगवान के सौंदर्य को देखकर राग नहीं जगता वैराग्य जागता है एक मां का अपने बालक के अन्दर वात्सल्य जागता है तो स्थनो में दूध आ जाता हैबिना स्वयं की शक्ति के अतुल बल नहीं मिल सकता ये तीर्थकर बालक की स्वयं की उपादान शक्ति थी उनकी भक्ति रही होगी सुन्दर वस्तु को देख कर लोग अपने परिणामों को बिगाड़ते है गर्भ से जन्मे वाला बालक इतना अपवित्र होता है कि उसे परिवार वाले भी नहीं छूते।लेकिन तीर्थकर बालक की दस अतिशय के साथ जन्म लेते हैं ये उपादान शक्ति को लेकर जन्मे हैं ये उनके कठोर तपस्या से प्राप्त किया।
.तीर्थंकर भगवान को भी इस धरा पर आना पड़ा
उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवान को भी इस धरा पर आना पड़ा उनकी भी वी आई पी व्यवस्था हो सकती थी नहीं लेकिन तीर्थकर बालक को भी माता की गोद में जन्म लेना पड़ा।बालक जन्म लेता है तब सारे घर को सुतक लगा देता है ऐसी माताऐ जिन्होंने कभी भगवान के दर्शन के बिना पानी भी नहीं पिया वे पैंतालीस दिन प्रभु के दर्शन नहीं मिलता।
वह निमित्त वह मोजूद नहीं था प्रभु वहीं से मोक्ष जा सकते थे मोक्ष जाने के लिए सबसे बड़ी निमित्त शक्ति मनुष्य पर्याय है उपादान कुछ नहीं किया जा सकता उपयोग को शुद्ध नहीं कर सकते नैमत्तिक शक्ति वह तीसरे वह अपने मन मानें मार्ग से नहीं चल सकते स्वयं पढ लेने से प्रमाण पत्र नहीं मिल सकता सज्जन की अपनी अलग पहचान होती है वह सतमार्ग पर चलते हैं वह किसी को अपने से बड़ा स्वीकार करते हैं सज्जन जिस रास्ते से गुजरते हैं वहीं रास्ता सत मार्ग कहलाता हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
