अतिशय योगी वात्सलय रत्नाकर आचार्य विमलसागर महाराज
तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जी में वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी की समाधि स्थली पर विराजित गुरु मंदिर
जहा पर पूज्य आचार्य भगवंत श्री विमल सागर जी गुरुराज की इस अलौकिक प्रतिमा की 108 परिक्रमा करने से मनोवांछित सुफल की प्राप्ति होती है,सम्पूर्ण यात्रा निर्विघ्न सानन्द संपन्न होती है।इस कालिकाल की 20वी सदी में युगश्रेष्ठ आचार्य हुए है वात्सल्य रत्नाकर श्री विमल सागर जी ऋषिराज
जिन्होंने अपने साधनाकाल में पूरे भारत का लगभग 5 बार पद विहार करते हुए धर्म प्रभावना की इसलिए इन्हे सर्वाधिक पद विहार संत कहा जाता है।श्री सम्मेद शिखर व सोनागिरी आपके हृदय को छुने वाले सर्वाधिक प्राण प्रिय तीर्थ थे। दीक्षा पूर्व अर्थात देश की आजादी के पूर्व किशोरावस्था में आपने कोसमा यूपी अपने गांव से साइकल के माध्यम से शिखर जी की यात्रा की थी।किसी श्रावक द्वारा सम्मेद शिखर जी के किसी भी टोक की मिट्टी नीचे लाने पर आप देखने मात्र से बता देते थे ये कोनसे टोक की मिट्टी है।20वी सदी के अंतिम दो दशकों में तीर्थराज सम्मेद शिखर को आपने विभिन्न प्रेरणा प्रयास से अत्यंत पवित्र रूप से सरक्षित करवाया।
आपसे दीक्षित शिक्षित शिष्य व आज्ञानुवर्ती रत्नों में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी,आजीवन अन्न छः रस त्यागी स्थिवराचार्य श्री संभव सागर जी,गणाधिपति गणधराचार्य श्री कुंथु सागर जी, प्रवर्तकाचार्य श्री नेमी सागर जी,गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी,आचार्य श्री विराग सागर जी व प्रथम गणिनी आर्यिका श्री विजयमति माताजी जैसे महान धर्म धुरंधर हुए।इसी से ज्ञात हो सकता है की जैन दर्शन को जो योगदान वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमल सागर जी भगवंत ने दिया है वो शायद ही अन्य कोई दे पाएगा।ऐसे महामुनि की दिव्य प्रतिमा की परिक्रमा साक्षात तीर्थराज की लाखो वंदना के समान पुण्यदाई है।
शाह मधोक जैन चितरी से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
