क्रोध में व्यक्ति अंधा हो जाता है गुणमति माताजी
सागर
श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर अंकुर कॉलोनी में धर्म सभा को संबोधित करते हुए आर्यिका 105 गुणमती माताजी ने क्रोध नहीं करने की सीख देते हुए इस पर प्रकाश डाला पूज्य माता जी ने कहा कि क्रोध करना होश में संभव नहीं होता है। इसका अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि क्रोध का अर्थ है बेहोश। क्रोध में यह जीव अंजाम तक को भूल जाता है। एवं क्रोध में व्यक्ति अंधा बहरा हो जाता है। वह मन में कुछ विचार भी नहीं कर पाता है। जब जीव क्रोध में होता है दो उसको यह तक पता नहीं होता है उसका क्या परिणाम होगा।
पूज्य माताजी ने क्रोध को जहर बताते हुए कहा कि जहर बिच्छू में है ही नहीं क्रोध करने वाले मनुष्य में ही हुआ करता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से बताते हुए माताजी ने क्रोध के विषय में कहा कि क्रोध करने से शरीर में विष व्याप्त हो जाता है। एक उदाहरण देते हुए कहा कि क्रोध में सुख, बिच्छू के डंक में आराम,अग्नि मैं शीतलता यह सभी असंभव है। एवं क्रोध के साथ करुणा का बीज संभव नहीं है।
मार्मिक उदगार प्रकट करते हुए माताजी ने कहा कि पल भर का क्रोध हमारे जीवन भर का अभिशाप बन जाता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
