मेला महोत्सव के लिए आर्यिका अंतर मति माताजी संघ को दर्शनोदय तीर्थ थूबोनजी में वार्षिक उत्सव में सानिध्य प्रदान करने के लिए मुंगावली पहुंचकर किया निवेदन। धर्म में रूचि बढ़ेगी तो पुण्य भी बढ़ता चला जाएगा–अंतरमति माताजी

धर्म

मेला महोत्सव के लिए आर्यिका अंतर मति माताजी संघ को दर्शनोदय तीर्थ थूबोनजी में वार्षिक उत्सव में सानिध्य प्रदान करने के लिए मुंगावली पहुंचकर किया निवेदन।
धर्म में रूचि बढ़ेगी तो पुण्य भी बढ़ता चला जाएगा–अंतरमति माताजी

अशोकनगर
–रोज रोज हम एक ही तरह का भोजन करते हैं तो रुचि कम हो जाती है, फिर आप क्या करते हैं पकवान बनाकर खाते हैं तो रुचि बढ़ जाती है। ऐसे ही जव डेली पूजन पाठ में रुचि कम होने लगें तो महा पूजन रचना चाहिए। भगवान को वैभव के साथ उच्च आसन पर बैठकर जब आप महा आराधना करगे तो आप की अंतर चेतना जाग उठेगी। आप जो समवशरण विधान कर रहे हैं जिस तरह का उत्साह उमंग है ये दिखा रहा है कि आपकी प्रसन्नता समा नहीं रही।

 

 

 

उक्त आश्य उद्गार आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका रत्न श्री अंतरमति माताजी ने मुंगावली के सुधा सागर मंगलीक सभागार में श्री समवशरण महा मंडल विधान सभा को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए।

दर्शनोदय तीर्थ थूबोनजी कमेटी के महामंत्री विपिन सिंघाई ने कहा कि 15 जनवरी को थूबोनजी में वार्षिक मेला महोत्सव है इसमें आर्यिका संघ का सान्निध्य चाहिए हम सब यही निवेदन लेकर आये है। इस दौरान कमेटी के अध्यक्ष अशोक जैन टिंगू सहित अन्य भक्तों ने आर्यिका संघ को श्री फल भेंट किए।

अधिक खुशी में भी आंसू निकल आते हैं अमंदमति माताजी
इसके पहले धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए आर्यिका श्री अमंदमति माताजी ने कहा कि जव आपके जीवन में दुःख आ जाता है या ज्यादा खुशी होती है तो आंसू निकलने लगते हैं ऐसे ही एक लकड़हारा जंगल से रोज कुछ लकड़ी काटकर लाया था एक दिन में किसी संत के पास से गुजर रहा था उसने संत जी मुख से सुना कि तुम जितने गहराई में जाओगे चाहे लोकिक हो पारलोकिक हो उपलब्धी मिलगी। अगले दिन वह लकड़हारा जंगल में आगे गया तो उसे चंदन के वन मिल गये उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा उसके आंसू निकल आए इसी तरह आप धर्म मार्ग पर बढ़कर सम्यक को प्राप्त करें फिर सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान के बाद हमें सम्यक चारित्र को धारण करना होगा तब हम मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ते चले जाएंगे। हजारों वर्षों की तपस्या के बाद केवल्य ज्ञान की प्राप्ति होती है तब कही तीर्थकर प्रभु का समवशरण लगता है जहां चारों निकाय के देव आते हैं और वह वस्तु स्थिति को समझ कर अपना कल्याण कर सकते हैं ।

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