समता ही परम धर्म है आचार्य कनकनदी
भीलुडा
समता शिरोमणि वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भीलुड़ा शांतिनाथ जिनालय में अंतरराष्ट्रीय वेबीनार ने बताया कि समता परम धर्म है। स्वयं में समता धारण करने के लिए धन, माइक, मंच, बैंड ,भीड़ किसी की भी आवश्यकता नहीं होती है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी समता धारण कर सकता है। जिसके जीवन में समता होती है वह किसी से भी प्रभावित नहीं होता है। कोई गाली दे, अपमान करें , प्रशंसा करें वह हमेशा प्रसन्न, स्वयं में लीन रहते हैं।
समता में रहना बहुत कठिन है। प्रदर्शन, लड़ाई झगड़ा, वाद विवाद करना सरल है। समता में रहने वाला व्यक्ति स्वच्छ जल की तरह अपना प्रतिबिंब देखता है परंतु विषमता रहने वाला व्यक्ति गंदे पानी की तरह अपने गुण दोष को नहीं देख पाता है। समता बिना कितना भी तप करेंगे, ध्यान अध्ययन करेंगे, उपवास करेंगे, नग्न रहें, केशलौच करें सब व्यर्थ है। जो समता धारण करते हैं उनमें सभी गुण आ जाते हैं। समताधारी व्यक्ति को कोई गाली गलौज करें तो क्रोध नहीं करते हैं तथा मन में भी उनके प्रति बुरा भाव नहीं रखते हैं। शरीर पर कष्ट देने वालों को भी क्षमा दान करते हैं। जो स्वयं पर विजय प्राप्त करते हैं वह हीरो of the hero होते हैं अतः वास्तव में हीरो तीर्थंकर, अरिहंत, सिद्ध ही है जो स्वयं पर विजय प्राप्त करते हैं। युद्ध में अन्य को हराना सरल है परंतु स्वयं पर विजय प्राप्त करना अति कठिन है। मुनि श्री सुविज्ञ सागर गुरुदेव जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित “समता आती है धीरे-धीरे” कविता द्वारा मंगलाचरण किया।
विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
