*चातुर्मास कर रायपुर से आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी ससंघ के मंगल विहार पर गुरुभक्तों के छलके आंसू*
*जैन मुनि सरोवर नहीं सागर होते हैं,इनका विहार नियत है : आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज*
रायपुर।
कोई रोक सको तो रोक लो,न जाओ गुरुवर,कुछ दिन और हमें मंगल देशना एवं आशीर्वाद और आपका ससंघ सानिध्य दीजिए। कुछ ऐसे ही भाव चातुर्मास के पश्चात रायपुर से विहार कर रहे आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ को रोकने के लिए गुरु भक्तों के थे। विदाई की बेला में गुरु भक्तों की आंखें नम थी और मन बस यही कह रहा था कि कुछ समय और रुक जाओ गुरुवर। दरअसल आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ ने सन्मति नगर फाफाडीह रायपुर से सोमवार दोपहर मंगल विहार किया। इससे पूर्व आचार्यश्री ने अपनी मंगल देशना और गुरु भक्तों को मंगल आशीष दिया।
आचार्यश्री ने कहा कि आप अनुभव करना कि यात्रा के लिए निकलो तो शारीरिक परेशानियां आ सकती है लेकिन मानसिक रूप से बहुत शांति मिलती है, इसलिए लोग यात्रा करते हैं। ऐसे ही विहार करेंगे तो श्रमणों का वात्सल्य बढ़ता है। यदि हम विहार न करते तो रायपुर में चातुर्मास कैसे हो पाता ? विहार करेंगे तो दूसरी जगह भी चातुर्मास होंगे और सबको आनंद मिलेगा। पानी नदी का बहता रहे तो सब जगह स्वच्छ पानी मिलता है,हर जगह की फसल हरी-भरी होती है। मित्रों सरोवर का पानी जगह-जगह की फसल को हरी-भरी नहीं कर पाता। ज्ञानियों जैन मुनि तलाब नहीं सागर होते हैं,इनके नाम के साथ सागर लगा होता है। ये समुद्र के समान व गंभीर होते हैं इसलिए इनका विहार नियत है।
आचार्यश्री ने कहा कि श्रावकों के अंदर आघात भक्ति, आघात अनुराग व वात्सल्य बढ़ने लगता है। अचानक विहार हो जाए तो इनको झटका लगता है इसलिए पूर्व से ही भूमिका बननी प्रारंभ हो जाती है। ऐसे में श्रावकों का दुख कम हो जाता है। दूसरा पक्ष यह है कि जब तक आकांक्षा बनी रहे धर्म के प्रति, गुरुओं की सेवा के प्रति और झुकाव बना रहे,जब तक इच्छाएं बनी रहे, तब तक अनिश्चित विहार कर देना चाहिए, यह भी परम सत्य है।
आचार्यश्री ने कहा कि चार माह तक सकल समाज ने मिलकर जो चातुर्मास की ऊंचाइयां प्राप्त की है, उसका प्रतिफल आपने कल संपन्न हुई जैनेश्वरी दीक्षा में देखा है। सन्मति नगर फाफाडीह में लोगों को पैर रखने का स्थान नहीं था। यह सब आपकी अंतस की आस्था व विश्वास है और ललक है। यही मंगल आशीष है कि जैसे आपने स्थापना से निष्ठापन तक और निष्ठापन से पंचकल्याणक तक,पंचकल्याणक से गोष्ठी तक और गोष्ठी से दीक्षा तक आपने जो आनंद लिया है,ऐसे ही आनंद भविष्य में आने वाले यति संघ के साथ लेना। इसी प्रकार से उनकी सेवा व वैयावृत्ति करना,मैं यह समझूंगा आपने चातुर्मास में बहुत कुछ सीखा है। हम आपको सिखा कर जा रहे हैं कि केवल विशुद्ध सागर व संघ आए तो ही नहीं, बल्कि जितने निर्ग्रन्थ तपोधन पधारे सब की सेवा करना।
आचार्यश्री ने कहा कि बहुत आनंद के साथ मंदिर और चातुर्मास समिति,सकल समाज, संपूर्ण मंदिर की समितियों ने मिलकर इस चातुर्मास को बहुत अच्छे से पूर्ण कराया है। ध्यान रखना अहिंसा महाव्रत का पालन,द्रव्य अहिंसा का पालन आपकी दृष्टि में है,लेकिन इससे भी गहरी अहिंसा का नाम भाव अहिंसा है। अधिक रुकेंगे तो राग की वृद्धि होगी और द्वेष भी खड़ा हो सकता है। अधिक रुकेंगे तो मुनिराज पंच दिखना प्रारंभ हो जाएंगे,इसका परिणाम यह होगा कि जैनत्व के प्रति आस्था कम हो जाएगी। इसलिए बहुत अच्छा है चातुर्मास के उपरांत,नियति की नियतता के अनुसार विहार करना ही होगा,यह ही भाव अहिंसा है।
आचार्यश्री ने कहा मुस्कुराहट इस बात की आना चाहिए कि चार माह एक से निकले। इतने दीर्घ समय में आपने छोटे-छोटे मुनिराजों और ब्रह्मचारियों की सेवा व वैयावृत्ति की,इसलिए समाज आशीर्वाद की पात्र है। अब हम यहां से विहार करेंगे, यह नियति की नियतता है। दिशाओं- दिशाओं से पक्षी आते हैं और समय पूरा होने पर चले जाते हैं। अब यहां हमारा भी समय पूरा हो चुका है। किंचित भी मन में विकल्प हो तो आप मुझे जरूर बताना। ये मुनिराज 24 घंटे क्षमा करते रहते हैं और क्षमा मांगते रहते हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि कुछ लोग पास आते हैं, कुछ लोग दूर रहते हैं,वे भले ही दूर रहे पर मर्यादा में रहना उनका धर्म था। यदि ऐसे मर्यादा में सारे त्यागी रहे तो देश में आनंद की धारा बह जाएगी। शासन-प्रशासन,संपूर्ण दिगंबर जैन मंदिर ने जैसे मिलकर इस चातुर्मास को पूर्ण किया है,आगे भी तब तक करते रहना,जब तक हम स्वयं अनंत दृष्टि को प्राप्त न हो जाएं। अजैन समाज ने भी आनंद लूटा है। आपकी गाड़ियां उनके घर के सामने खड़ी रहती थी,इतने माइक चलते थे,फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा। हर समाज का आदमी खुश था, इसलिए उनके घर भी मेरा आशीर्वाद भेजना।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
