आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज का निष्प्रह जीवन कहने का नही देखने का रहा है आचार्य वर्धमान सागर
कोपरगाँव महाराष्ट्र
आचार्य श्री धर्म सागर जी का जीवन निष्प्रही रहा, उन्होंने सरलता एवं सहजता को जीवन में कभी छोड़ा नहीं। वह पूर्णिमा के समान सरल रहे। उनका जीवन कहने का नहीं, देखने आचरण में अनुसरण करने का रहा है। आचार्य श्री का पुण्य अलग विशेष प्रकार का था। जिससे उन्हें यश मिला उनकी चर्या चारित्र ने लोगों को प्रभावित किया।
यह प्रभावशाली उदगार तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्म सागर जी के 109 वीं जन्म जयंती पर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने कोपरगांव में व्यक्त किये।
श्री राजेश पंचोलिया इंदौर ने बताया कि
आचार्य श्री ने विस्तार में बताया की 1008 श्री धर्मनाथ भगवान के केवल ज्ञान कल्याणक दिवस पर आप का अवतरण होना, मुनि दीक्षा के बाद श्री धर्म सागर जी नामकरण होना, तथा आपका समाधी दिवस पर 1008 श्री मुनिसुव्रत नाथ भगवान का कल्याणक होना दिव्य विभूति का अद्भुत संयोग है।
जीवन व्यक्तित्त्व पर प्रकाश डाला
आचार्य श्री ने इसके पूर्व बतायाक़ कि बचपन में श्री चिरंजीलाल के माता-पिता तथा चचेरी बहन दाखा बाई के माता-पिता सास-ससुर का बीमारी में निधन होने से जीवन यापन के लिए दोनों भाई-बहन इंदौर आए। मात्र 16,17 वर्ष की आयु में कपड़ा मिल में जीव हिंसा देखकर नौकरी छोड़ दी। वह स्वयं का स्वतंत्र व्यापार किया। ग्रहस्थ अवस्था में इतने निष्प्रही थे की उस समय दिन भर के लिए एक रुपए की बचत मुनाफा होने पर व्यापार बंद कर वापस घर आ जाते थे। इंदौर रहते हुए आचार्य कल्प श्री चंद्र सागर जी मुनिराज के सानिध्य में व्रत नियम धारण किये। साथ ही
क्षुल्लक दीक्षा के बाद बड़वानी में गुरु के वियोग होने पर आचार्य श्री वीर सागर जी के संघ में शामिल हुए।
संस्मरण सुनाए
आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने दीक्षा गुरु आचार्य के जीवन के अनेक संस्मरण सुनाए उन्होनें बताया आचार्य शिव सागर महाराज की समाधि होने से सन 1969 में आचार्य श्री धर्म सागर महाराज तृतीय पट्टाधीश बने।व उसी दिन नवीन आचार्य ने 11 दीक्षा भी दी। जिसमें स्वयं मुनि श्री वर्धमान सागर जी भी 19 वर्ष की उम्र में दीक्षित हुए।
आचार्य धर्मसागर महाराज जीवन बताता है समाधी साधना केसी होती है।
आचार्य ने प्रकाश डालते हुए कहा धर्मसागर जी ने अपने जीवन से बताया की समाधी साधना कैसे होती है, उन्होंने प्रतिदिन आहार को क्रम से त्याग किया, आचार्य श्री ने बताया कि गुरुदेव ने हमें दीक्षा देकर हमारा वैराग्य का मार्ग प्रशस्त किया। तथा उनका आशीर्वाद हमेशा हमारे मस्तक पर बना रहा। पुनीत अवसर पर कोटिशः कोटिशः नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार
संकलन अभिषेक लुहाड़िया रामगंजमंडी
