नगर गौरव शिष्य मुनि की जन्म नगरी में आचार्य श्री का प्रथम प्रवेश 17को
बोलीं राजस्थान
प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि आचार्य
श्री वर्धमान सागर महाराज का विहार
श्री महावीर जी से किशनगढ़ की और संघ सहित चल रहा है।
श्रावको के निवेदन आग्रह कर अपने प्रभावक परम शिष्य मुनि श्री 108 हितेंद्र सागर महाराज की जन्म भूमि बौली में वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज का पहली बार संघ सहित 17 नवंबर को भव्य मंगल प्रवेश होगा।
गुरुदेव के प्रथम नगर आगमन को लेकर जैन समाज ही नहीं संपूर्ण नगर उत्साहित हैं ।




समाज अध्यक्ष श्री महेश जैन ने बताया कि समाज के श्री बाबूलाल जैन ,श्री सुरेशचंद जैन, श्री महावीर जैन, श्री प्रदीप जैन, श्री जिनेंद्र जैन, श्रीपदम सोगानी, श्री ऋषभ जैन, श्रीअशोक जैन, श्री अमोलकचंद जैन, श्री पूरणमल जैन, श्री संतोष जय, श्री राजेंद्र अनोपडा सहित महिलाओ में श्रीमती सुनिता जैन, श्रीमती केलादेवी जैन, ,श्रीमती गुणमाला जैन, विमलादेवी जैन, ,संतोष जैन,अनीता जैन,,अंकिता जैन,,शांति देवी जैन,चंदा देवी जैन,प्रेमदेवी जैन, सहित सभी प्रथम प्रवेश को ऐतिहासिक बनाने के लिए नगर को जैन झंडे ,फ्लेक्स बैनर से सजा रहे हैं । घर घर रांगोली बनाई जा रही हैं ।
समाज से कार्यक्रम को सफल बनाने का अनुरोध किया हैं।

एक परिचय हितेंद्र सागर महाराज का
श्रीमती सुनिता श्री सुरेश चंद जी शाह के सुपुत्र श्री महेंद्र जी का जन्म 7 फरवरी 1977 को हुआ।
आपने बचपन में हायर सेकंडरी की लौकिक शिक्षा बोलीं में प्राप्त कर एम ए की शिक्षा जयपुर कालेज में प्राप्त की। आप बाल ब्रह्मचारी है,आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से क्षुल्लक दीक्षा श्रवण बेलगोला में 10 मार्च 2006 को तथा आचार्य श्री से ही मुनि दीक्षा
9 अक्टूबर 2008 को सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेद शिखर जी में हुई आपका नाम मुनि श्री हितेंद्र सागर जी किया गया।
आचार्य श्री का वात्सल्य
संस्मरण
मैं हूं ना
चंपापुर 2009 चातुर्मास की बात है मुनि श्री हितेंद्र सागर जी को निरंतर अंतराय चल रहा था, आहार काफी दिनों से ठीक नहीं हो रहा था और जिस कारण शरीर निर्बल होता जा रहा था ।मुनि श्री हितेंद्र सागर जी इन्ही अंतरायो की श्रंखला में बगीचे के मंदिर में बैठे थे ,अचानक उन्हें घबराहट हुई और वह वही भगवान की प्रतिमा के पास लेट गए ।इधर आचार्य श्री महाराज देख रहे हैं कि मुनि हितेंद्र सागर जी अभी तक नहीं आए रोज तो बगीचे के मंदिर से इस समय तक आ जाते थे ।शंका हुई तो आचार्य महाराज बगीचे के मंदिर में पहुंचे देखा कि मुनि हितेंद्र सागर जी लेटे हुए हैं, आचार्य श्री ने हिलाया लेकिन शरीर में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। आचार्य महाराज ने कमंडल से पानी लिया चेहरे पर डाला तो मुनि हितेंद्र सागर जी को चेतना आई , हितेंद्र सागर जी देखते हैं कि मेरा शरीर तो धीरे-धीरे ठंडा होता जा रहा है तो मुनि श्री ने आचार्यश्री से कहा कि अगर आपको मेरे बारे में कुछ लगता है तो मेरा त्याग करा दो और मेरी सल्लेखना करा दो ।तब आचार्य श्री ने कहा मैं हूं ना इतना वात्सल्य देखकर मानो मुनि श्री उनमें नई चेतना आ गई और उन्हें इससे बहुत हिम्मत मिली।
शिष्य का समर्पण और गुरु का वात्सल्य अनुकरणीय एवम् प्रशंसनीय हैं।
राजेश पंचोलिया वात्सल्य भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
