जब एक श्रेष्ठ आचार्य अपने गुरु को अपना पद देते हुए अपने शिष्य को निवेदन मुझे अपना शिष्य बनाएं आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के आचार्य पदारोहण दिवस पर आलेख

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जब एक श्रेष्ठ आचार्य अपने गुरु को अपना पद देते हुए अपने शिष्य को निवेदन मुझे अपना शिष्य बनाएं आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के आचार्य पदारोहण दिवस पर आलेख
इस युग का सौभाग्य रहा जिस युग में जन्मे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज हम सभी के लिए यह बहुत ही पुण्य का अवसर है कि ऐसे महा संत के जीवन काल में हमें जन्म मिला और उनके दर्शन का पुण्य हमें प्राप्त हुआ उनके चरण वंदना का हमें अवसर मिला। जो अनंत जन्मों के पुण्य से ही प्राप्त हो सकता है।

 

 

आज हम सभी आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज का आचार्य पदारोहण दिवस बना रहे है। गुरुवर ऐसे संत हैं जिन्हें हम मानव नहीं महामानव कहेंगे। इस युग के भगवान कहेंगे। और कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी हम तो इन्हें साक्षात तीर्थंकर कहेंगे।

जब उन्हें आचार्य पद दिया गया यदि उसे विषय पर हम चर्चा करें और उस पर हम अपनी बात उल्लेखित करें तो वह समय था 22 नवंबर 1972 का जब महाकवि आचार्य गुरुवर 108 ज्ञान सागर महाराज द्वारा अपने परम शिष्य मुनि श्री 108 विद्यासागर महाराज को अपना आचार्य पद प्रदान किया।

अर्धशतक से अधिक उसे समय को आज बीत चुका है और उसे समय की हम बात करें जब गुरुवर ज्ञान सागर महाराज ने इन्हें अपना पद प्रदान किया तब उनके यह शब्द थे एक साधक के अपने जीवन के अंतिम समय में सभी पद का त्याग आवश्यक माना गया है।

 

 

 

और उन्होंने यह भी कहा था कि एक समय ऐसी अवस्था मेरी नहीं है कि मैं संलेखना को उदाहरण कर सकूं। और मुनि श्री विद्यासागर महाराज से कहा तुम्हें आज गुरु दक्षिणा अर्पण करनी होगी। उसी के फल स्वरुप तुम्हें यह आचार्य पद धारण करना होगा।

मुनि श्री विद्यासागर महाराज इस पद को नहीं चाहते थे लेकिन गुरु ने गुरु दक्षिणा की बात कह दी तब विद्यासागर महाराज निरुत्तर हो गए जो बहुत ही भाव विभोर कर देने वाले क्षण थे। मक्सी कृष्ण द्वितीया संवत 2023 बुधवार 22 नवंबर 1972 वह क्षण जब आचार्य श्री ज्ञान सागर महाराज ने अपने ही कर कमलो से अपना आचार्य पद मुनि श्री 108 विद्यासागर महाराज को संस्कारित कर अपने सिंहासन पर विराजमान कराया।

एक आचार्य का अपने शिष्य को अपना पद देना सहज माना जा सकता है। लेकिन वह क्षण जब वहा मौजूद भक्तों एवं समुदाय के सजल नेत्रों से अश्रु की धार बहने लगी। जिसका उल्लेख करते हुए मेरी भी आंखें नम सी हो जाती है क्या कोई उत्कृष्ट पद पर होने के बाद अपना मान मर्दन कर सकता है। जी हां आचार्य गुरुवर ज्ञान सागर महाराज ने ऐसा ही किया और उन्होंने अपने शिष्य को आचार्य पद देते हुए आचार्य पद के सिंहासन पर विराजमान कर स्वयं मुनि के समान नीचे बैठकर नूतन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की चरणों में नमन कर बोले है आचार्य वर नमोस्तु, यह शरीर रत्नत्रय की साधना में शिथिल होता जा रहा है। इंद्रियां अपना सम्यक काम नहीं कर पा रही है। अतःआपके श्री चरणों में विधिवत संलेखना पूर्वक समाधि मरण धारण करना चाहता हूं। कृपया मुझे अनुग्रहित करें। निश्चित रूप से यह अलौकिक क्षण एक प्रेरणादायक उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं। की आचार्य गुरुवर ज्ञान सागर महाराज ख्याति लाभ से परे थे। सचमुच ज्ञान ज्योति के पूज थे। यथा नाम तथा गुण को उन्होंने सार्थक किया।

और आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने जिन धर्म की ध्वज को पुलकित एवं गूंज मान किया है। उनके तप उनकी साधना पर कई तरह की शोध हो चुकी है और हो रही हैं। क्या नेता क्या अभिनेता। हर वर्ग गुरु चरणों में नमन करता दिखाई पड़ता है।

एक शिष्य का गुरु के प्रति क्या कर्तव्य होता है वह आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज ने सार्थक भी किया और अपने गुरु की खूब सेवा की आचार्य गुरुवर ज्ञान सागर महाराज ने ज्येष्ठ मास की अमावस की प्रचंड उष्ण गर्मी में चार दिनों के निर्जल उपवास पूर्वक 1 जून 1973 को 10:10 पर इस नश्वर देह को त्याग कर समाधि मरण को प्राप्त हुए।

कुछ पंक्तियों से वर्णन करेंगे
जो मोक्ष मार्ग पर खुद चलते हैं और शिष्यों को चलाते है उन्हें आचार्य कहते हैं।
जो शास्त्र को स्वयं पढ़ते और शिष्यों को पढ़ाते उन्हें उपाध्याय कहते हैं।
और जो सदा ध्यान में सदा लीन रहते हैं उन्हें साधु कहते हैं।
पर यह तीनों काम जो अकेले ही करते हैं उन्हीं को संत विद्यासागर कहते हैं।

 

हर दिशाएं दिनकर को जन्म नहीं देती
हर रात शरद पूनम के चांद को जन्म नहीं देती।
होती है माताएं भी हजारों जगत में
पर हर माता विद्यासागर जैसे संत को जन्म नहीं देती।

 

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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