मन को उज्जवल और पवित्र बनाने की आवश्यकता है समयसागर महाराज

धर्म

मन को उज्जवल और पवित्र बनाने की आवश्यकता है समयसागर महाराज
कर्रारपुर
निर्यापक श्रमण समय सागर महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्याज को मिटाने के लिए जल ही जीवन है, ऐसा कहा जाता है। किंतु जल यदि मटमेला होता है तो पीने योग्य नहीं होता है। इसी प्रकार भगवान की भक्ति के लिए मन आवश्यक है। मन को उज्जवल और पवित्र बनाने की आवश्यकता है। पाप को पतला करने की आवश्यकता है। इसमें पुण्य अपने आप गाढ़ा हो जाएगा।
पुण्य पाप के विषय में उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि पुण्य और पाप के अलग-अलग परिणाम होते हैं। परंतु एक समय में यह कि परिणाम हो सकता है, या तो शुभ या अशुभ चेष्टाएं होगी। संक्लेश परिणाम अपने आप नहीं होते, बिना कारण कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता। चाहे वह अलौकिक कार्य हो अथवा परमार्थ का कार्य हो प्राणी विषयों के प्रति आसक्ति होने के कारण अति संक्लेशित परिणाम को प्राप्त कर लेता है। इसी के साथ मरण करके नरक गति को प्राप्त होता है। जो व्यक्ति धर्म से दूर रहेगा वही उसकी दुर्गति का कारण है। उत्थान एवं पतन बिना परिणाम के संभव नहीं है।

 

 

 

 

आचार्य कहते हैं जितने भी कर्म होते हैं उन कर्मों के अर्जन में कोई ना कोई वस्तु निमित्त के रूप में उपस्थित होती है। कर्म बंद के क्षेत्र में हर व्यक्ति स्वतंत्र है। आप करना चाहो तो करो। नहीं करना चाहो तो कोई भी व्यक्ति आप को बाध्य नहीं कर सकता। यदि आपकी इच्छा संसार में प्रवेश करने की नहीं है तो भगवान भी आपको बात भी नहीं कर सकते। व्यक्ति स्वयं की इच्छा से प्रवृत्ति करता है। संसारी प्राणी जो भी कार्य करता है वह स्वयं की इच्छा से ही करता है। देव शास्त्र गुरु की आराधना करते समय मन के भाव पवित्र रखना चाहिए। शब्द के द्वारा सब कुछ होता है ऐसा नहीं है। शब्द तो वस्तु के स्वरूप तक पहुंचने के लिए एक माध्यम है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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