मनुष्य एक दिन में 60,000 विचार करता है उसमें अधिकांश अपध्यान ही करता है आचार्य कनकनंदी
भीलूडा
अभिक्ष्णज्ञानोपयोगी आचार्य
कनकनंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि सांसारिक लोग सतत अपध्यान ही करते हैं। मनुष्य 1 दिन में 60000 विचार करता है। उसमें अधिकांश अपध्यान ही करता हैं। गृहस्थी अधिकांश हिंसादान, पापदान, परिग्रह दान ही करते हैं। जिनवाणी को सम्यक रूप से नहीं समझते हैं वह दुश्रुति है। चिंतन करना चाहिए चिंता नहीं। चिंता से पाप ही होता है। चिंता छोड़कर आत्म चिंतन करना चाहिए। ईर्षा द्वेष घृणा आदि भी अपध्यान है। किसी की विजय, किसी के हार, किसी का अधिक लाभ, किसी की हानि आदि विचार भी अपध्यान है। किसी के सफल बनने का चिंतन भी उसके प्रति राग है। स्व के आर्थिक विकास पारिवारिक विकास की चिंता , लड़के लड़की की शादी की चिंता व्यापार उद्योग की चिंता आदि अपध्यान है।
यह अपध्यान साधु को तो करना ही नहीं चाहिए परंतु श्रावको को भी इससे बचना चाहिए। शादी की अनुमोदना करने से वह जो पाप करेंगे उसके भागीदार हम बन जाएंगे। व्यापार में ग्राहक को ठगना भी सफेद चोरी है। पशु पक्षी को बांधना, दास प्रथा, ताड़न करना, अपमान करना सब पाप है। खोटे विचार का स्मरण भी पाप है। किसी भी धार्मिक कार्य में बंधन नहीं होने चाहिए सभी स्वेच्छा से करने चाहिए।
विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
