*मैं 25 वर्ष की हो चुकी हूं अपना निर्णय स्वयं ले सकती हूं*
जी हां इस आलेख का यही टाइटल देना उचित होगा क्योंकि श्रद्धा वाकर ने इसी लाइन को बोलकर अपने पिता के विश्वास का हनन कर दिया था। यूं कहें कि अपने माता-पिता के अस्तित्व को ही नकार दिया था तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित हो चुकी थी तो फिर इतना गलत निर्णय कैसे लिया गया, क्या पढ़ने लिखने से किसी भी बेटी की बुद्धि अपने मां बाप से भी अधिक हो जाती है या उसे मां बाप के फैसले पर सवाल उठाने का अधिकार मिल जाता है।
श्रद्धा के टुकड़ों ने कई सवाल टुकड़ों में उछाल दिए हैं उन सवालों के जवाब मिलना बहुत जरूरी है। भविष्य में कोई और श्रद्धा किसी आफताब का शिकार ना हो उसके लिए भी सतर्क रहना बहुत जरूरी है। कई सारे आफताब एक साथ दरिंदगी करने के लिए घूम रहे हैं लेकिन समझदार श्रद्धा उनके विश्वास में क्यों फंस रही है ?अपने मां-बाप के विश्वास का हनन करके क्या श्रद्धा नई श्रद्धा की ओर अग्रसर होकर अपने जीवन को सुरक्षित बचा पाई? हर बेटी को यह समझना होगा कि उसके मां-बाप कभी भी उसके लिए गलत निर्णय नहीं ले सकते हैं । मर्यादाओं संस्कारों और माता पिता के विश्वास का खंडन करके टुकड़ों में विभाजित कर दिया और उसका परिणाम टुकड़ों में ही मिला।
*विश्वास नहीं था यह श्रद्धा का*
*प्रभाव था फूहड़ सभ्यता का*
*संस्कारो का यदि बीज डला होता*
*शिकार न होती किसी आफताब का*
वर्तमान परिस्थितियों में माता पिता अपनी जीवन की व्यस्तता में या यूं कहें की आधुनिक दौड़ में स्वयं को शामिल करते हुए अपनी औलाद को उचित संस्कार नहीं दे पाते हैं। कुछ परिस्थितियां भी इस प्रकार से उलझ जाती हैं की सुलझ ही नही पाते हैं।
आवश्यकता है वर्तमान में एक मुहिम चलाने की, अपनी बेटियों को समझाने की। एक छोटा सा प्रयास अगली श्रद्धा को रोक सकता है टुकड़ो में बँटने से। इस तरह की विचारधारा संस्कृति सचमुच झकझोर देती है जो करारा व्रजपात है। उन बातो को भूला दिया गया है
मात पिता ये मूल उदगम है
ये ही तो साक्षात देव रूप है।
संजय जैन बड़जात्या कामां
संकलित
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
