वर्तमान में विराजित संतो में सबसे वरिष्ठ वयोवृद्ध महान आचार्य श्री संभव सागर जी गुरु भगवंत –
जिनकी वंदना लाखो उपवास,सैकडो आचार्यों व हजार मुनि की वंदना के समान पुण्यदाई है।
भगवान महावीर स्वामी के पश्चात आचार्य कुंदकुंद स्वामी के 1300 वर्षो बाद तक भी दिगंबर श्रमण परंपरा सम्पूर्ण भारत में निर्बाध्य रूप से चलती रही किंतु उसके बाद विदेशी आक्रांताओं के आतंक घटनाक्रमों से यह क्रमबद्ध पावन श्रमण परंपरा विलुप्त सी हो गई।
लेकिन विश्व जन के महान पुण्योदय से विश्वगुरु भारत में इस 20वी सदी के प्रारंभ में दिव्य पुण्य महापुरुष तीन महामुनि दीक्षित हुए
1.आचार्य श्री आदिसागर जी अंकलीकर 1913
2.आचार्य श्री शान्तिसागर जी दक्षिण 1920
3.आचार्य श्री शान्तिसागर जी छाणी 1923
आप तीनो महामुनियों के द्वारा 20 वी सदी में तीन श्रमण परंपरा जीवंत हुई जो हम समस्त जैन अनुयायियों के लिए एक समान पूजनीय है।जो आज भी जयवंत है और आगे भी सूर्य के समान दैदीप्यमान रहेगी।
इसी पावन त्रय परंपराओं में से एक आचार्य श्री आदिसागर जी अंकलीकर स्वामी के पट्ट शिष्य,18 भाषाओं के ज्ञाता,अनेक सिद्धियों के धारी,आगम के महा ज्ञानकोष धारी आचार्य श्री महावीरकीर्ती जी ऋषिराज हुए जिनके द्वारा जैन दर्शन के अनेक अद्वितीय तपस्वी रत्न तराशे गए।
जिनमे वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी ऋषिवर सबसे अनमोल विरले रत्न हुए। जिन्होंने अपने गुरु से दीक्षित हुए समस्त अनुजो, स्व शिष्यों व अन्य अनेकानेक दिगंबर जैन श्रमणो को भी अपनी वात्सल्य छाव में पल्लवित किया।
ऐसे ही द्वय महागुरुओ की पावन छत्रछाया को पाने वाले पूज्य स्थिवराचार्य श्री संभवसागर जी महामुनिराज है।
56 वर्ष से दीक्षित चिरकाल से साधनारत वरिष्ठ महातपस्वी आचार्य श्री सम्भवसागर जी ऋषिवर का संक्षिप्त परिचय –
आपका जन्म अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी व भारतवर्ष के महान सम्राट रहे महामुनि चंद्रगुप्त मौर्य की समधी भूमि वाले हरे भरे नारियल के वृक्ष वाले जंगलों से सुसज्जित राज्य कर्नाटक के मंगलोर जिले के बेंदू गांव में सूर्य वंशी क्षत्रिय परिवार में दिनांक 3 मई 1941 को हुआ।
बेंदूर गांव वैष्णव सम्प्रदाय बहुल गांव है जहा एक अत्यंत प्राचीन पार्श्वनाथ जिनालय के अवशेष है जो सिद्ध करता है की शताब्दियों पूर्व इस गांव में जैन समुदाय का अस्तित्व था।
इसी गांव में पोस्टमास्टर श्रीमान बाल्लिया होबलीवर जी व पार्वती देवी जी नामक सूर्य वंशी क्षत्रिय दंपत्ति रहते थे।जो धर्म निष्ठा थे। इनकी 9 संताने हुई जिसमे 3 पुत्रियां व 6 पुत्र हुए इन्ही मेंसे एक भाव्यात्मा हुए मंजूनाथ
माता पिता की लाडले बालक मंजूनाथ जब 8 वर्ष के हुए तो उन्हें स्वप्न आया की एक दिगंबर जैन तपस्वी उन्हें बार बार आशीष दे रहे है,मंजूनाथ ने अपने जीवन में कभी दिगंबर संत नही देखे थे,फिर भी इस तरह का स्वप्न देखने पर उन्होंने अपने माता पिता को इसकी जानकारी दी,
पिता जी श्री बाल्लिया जी ने एक बार सिद्ध ज्योतिषी के आने पर मजूनाथ का हाथ व जन्म कुंडली दिखाई जिसे देखकर ज्योतिषी ने कहा की आपका बालक एक तेजस्वी तपस्वी महान दिगंबर जैन संत बनेगा,जिस पर पिता जी ने कहा की हम जिस क्षत्रिय परिवार से उस परंपरा में ऐसे कोई जैन संत नही होते न ही देखने मिलते तो भला कैसे संभव होगा।जिस पर ज्योतिष बोला,की यह जैन दर्शन को अंगीकार करेगा और जैन संत बनेगा।
पिता जी ने इस चर्चा को भुलाकर मंजूनाथ की शिक्षा पर ध्यान आकर्षित किया,मंजूनाथ 9 वी तक की शिक्षा में कन्नड़,अंग्रेजी व हिंदी में दक्ष हो गए पर किन्ही कारणों से वे आगे की लौकिक शिक्षा का अध्ययन नही कर सके और अपने परिवार को आर्थिक संबल देने उन्होंने राजकीय वाहन में परिचालक का कार्य किया,वहा से बढ़ते बढ़ते बेंगलोर में सरकारी पद पर कार्य भी किए किंतु भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी को देखकर उन्होंने इन कार्यों को छोड़कर तुमकुर के पास मंदारगिरी गए जहा इन्होंने जीवन में प्रथम बार किन्ही दिगंबर जैन प्रतिमाओं के दर्शन किए।
वहा पर उन्हें क्षुल्लक श्री विश्वहेत जी का सानिध्य मिला, जिनसे उन्हें पहली बार जैन आध्यात्म व धर्म का श्रवण मिला,जिसे पाकर वे अत्यंत गदगद हुए,अब वे जैन धर्म को जानने उनके साथ अधिक दिनों का समागम पाने को आतुर थे। होनहार जिज्ञासु को देखकर क्षुल्लक जी ने स्वीकृति प्रदान की,क्षुल्लक श्री विश्वहेत जी 50 दिनों की तप साधना में लीन हुए जिसमे सिर्फ स्वाद रहित मठ्ठा व चावल का आहार ही होता था,इस स्वाद रहित आहार को मंजूनाथ ने अपने जीवन का ध्येय बना दिया और क्षुल्लक जी के साथ मंदारगिरि से विहार करते समय उन्होंने भी दही,नमक व तेल आदि तीन रसों का त्याग व वस्त्रों में कमीज का त्याग कर दिया।
क्षुल्लक श्री विश्वहेत जी के साथ मंजूनाथ विहार करते करते आंध्रप्रदेश के बलवंडा पहुंचे, जहा क्षुल्लक श्री विश्वहेत जी ने मुनि दीक्षा ग्रहण की नाम पाया मुनि श्री अजीतकीर्ति जी गुरुदेव,वहा पर उन्होंने मंजूनाथ की भावना को देखकर आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत प्रदान कर नामकरण किया ब्रह्मचारी चंद्रकीर्ति,उनसे ज्ञानार्जन भी किया फिर मुनि श्री अजीतकीर्ति जी ने उन्हें शाश्वत तीर्थ राज सम्मेद शिखर जी यात्रा की प्रेरणा देते हुए कहा की ब्रह्मचारी जी आप गांव गांव नगर नगर पद विहार तो कभी श्रद्धालुओं की सहायता से वाहन के माध्यम से शिखरजी जाओ। गुरुवाणी सिद्ध हुई और शिखर जी में गए जहा तीर्थ वंदना के साथ संत संगति में अच्छा समय व्यतीत कर वे दिल्ली के अनेक जिनलायो में धर्म आराधना करते हुए अपने धर्म ध्येय व जैनत्व को पुष्ट किया व संयम दीक्षा के भाव बढ़ने लगे,इसी कड़ी में महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर गए जहा महान पुण्योदय से वे वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमल सागर जी गुरुदेव के सानिध्य में गए,जहा उनकी संकल्प शक्ति व ज्ञान पिपासा को देखते हुए वात्सल्य रत्नाकर स्वामी ने दिनांक 8 जुन 1964 को उन्हें सात प्रतिमा व्रत प्रदान कर ब्रह्मचारी पार्श्वकीर्ति बनाया।
आत्म विकास के पथ पर तीव्र गति से बढ़ रहे विलक्षण प्रतिभा के धनी ब्रह्मचारी पार्श्वकीर्ति को आचार्य श्री विमलसागर जी ने युग के कालजयी विश्व संत अपने गुरु आचार्य श्री महाविरकीर्ति जी के दर्शनार्थ जाने व उनसे दीक्षा की भावना प्रकट करने के लिए श्रवणबेलगोला भेजा।
वहा पर पार्श्वकीर्ति को देखकर आचार्य श्री अत्यंत प्रभावित हुए तो पार्श्वकीर्ति भी पूज्य आचार्य श्री की साधना, निस्पृहता व उत्कृष्ट चर्या से श्रद्धा युक्त अत्यंत पुलकित हुए
उन्होंने आचार्य श्री से दीक्षा का निवेदन किया पर आचार्य श्री ने उनकी अनेक तरह से परीक्षा ली,विविध प्रश्न किए और पार्श्वकीर्ति जी से पूर्ण रूप से संतुष्ट होकर व उनके परिवार से स्वीकृति, परिजनों को भी अष्ट मुलगुणो के पालन का नियम देकर दीक्षा हेतु स्वीकृति प्रदान की।
दिनांक 6 जुलाई 1967 को हुमचा पद्मावती तीर्थ क्षेत्र पर तीर्थभक्ति शिरोमणी आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी ऋषिराज ने एक साथ दो
भव्यात्मन युवाओं को जैनेश्वरी मुनि दीक्षा प्रदान की।
जिसमे पार्श्वकीर्ति जी को मुनि श्री संभवसागर जी व अन्य युवा को मुनि श्री कुंथुसागर जी के नाम दिया।
पांच वर्षो तक गुरु सानिध्य में निरंतर ज्ञान ध्यान तपोसाधना में लीन रहे।
दीक्षा गुरु ने अपनी समाधि से पूर्व मुनि श्री सन्मति सागर जी को आचार्य व उपाध्याय,मुनि संभवसागर जी को स्थिवर,मुनि श्री कुंथूसागर जी को गणधर,मुनि श्री नेमीसागर जी को प्रवर्तक पद प्रदान कर चर्तुविध संघ की स्थापना की।
ब्रह्मचर्य व्रत प्रदाता गुरु वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमल सागर जी ने अपने शिष्य व अनुज की योग्यता को भापकर 31 जुलाई 1980 में मुनि श्री संभव सागर जी को आचार्य पद पर सुशोभित किया।
पूज्य स्थिवराचार्य श्री संभव सागर जी पिछले दो दशकों से आजीवन छः रस व अन्न का त्याग कर चुके है।
शाश्वत तीर्थराज सम्मेद शिखरजी में आप उत्तम समाधि व आत्म साधना के ध्येय के साथ विद्यमान है।
आगंतुक दर्शनार्थी को प्रातः 8 बजे से 10 बजे तक 56 वर्षो से साधनारत ऐसे महान संत के प्रवचन,स्वाध्याय व निकट से चरण वंदना का लाभ मिलता है।
अन्य शेष समय आचार्य भगवंत प्रायः एक छोटे से गुफानुमा कक्ष में अपने मुनि सुशिष्यो के साथ जाप ध्यान साधना में रत रहते है जहा आगंतुक दर्शनार्थी को बाहर से दर्शन की स्वीकृति होती है।

पूज्य आचार्य श्री दो प्रतिमा या उससे अधिक व्रत धारी श्रावको से ही आहार ग्रहण करते है।
वर्तमान में साधना महोदधी अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने शिखर जी में आपसे 557 दिनों का सिंह निष्कृडीत व अखंड मौन व्रत का संकल्प लिया तो मुनि श्री पियूष सागर जी ने आजीवन अन्न त्याग का नियम लिया।
शिखर जी में आने वाले प्रत्येक संत को आप अनूठे वात्सल्य की छत्रछाया प्रदान करते है।संघस्थ एलाचार्य श्री मोक्षसागर जी आपकी सेवा वेयावृत्ती व आर्यिका श्री चैतन्य मति माताजी आपकी आज्ञा में सदैव तत्पर रहते है
पूज्य आचार्य श्री संभवसागर जी की वंदना लाखो उपवास,सैकडो आचार्यों व हजार मुनि की वंदना के समान पुण्यदाई है।वर्तमान में विराजित संतो में सबसे वरिष्ठ पूज्य स्थिवराचार्य श्री संभवसागर जी ऋषिराज के चरणो में अविनाशी नमन
-शाह मधोक जैन चितरी से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
