दिनभर किये गए कार्यो का चिन्तन करे अनुचित हुआ तो प्रायश्चित करे मुनि श्री

धर्म

दिनभर किये गए कार्यो का चिन्तन करे अनुचित हुआ तो प्रायश्चित करे मुनि श्री
खुरई
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य पूज्य मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने जीवन जीने की कला की और अपना उदबोधन दिया, मित्रों शब्द का प्रयोग करते हुए मार्मिक बात कही पल पल हम मृत्यु की और है, इस तन के पिंजरे के कब प्राण पखेरू उड़ जाए नही भरोसा?
इसी लिए आप सभी को कह रहा हु जो कार्य करने जैसा है, वह शुभ है, वह पुण्य है, वही धर्म है, उसमे देरी करना भूल है। एक बात की औऱ सभी का ध्यान मुनि श्री ने आकृष्ट किया रात को सोने से पूर्व दिन भर किये गए कार्यो का चिन्तन मनन करे। अगर अनुचित हुआ है तो उसका प्रायश्चित करे। और आगे न करने का संकल्प ले। भाव भीने शब्द मुनि श्री ने कहे जो यथार्थ है, अगर मानवीय जीवन मे सत्यम शिवम सुंदरम कला आ जाती है, वह मानव को पशुत्व से ऊँचा कर मानवत्व,देवत्व, और भगत्व कोटि की और लाती है।
मुनि श्री ने कहा जो व्यक्ति जीवन जीने की कला को जान लेता है, वह पाप से बचने का ध्यान रखता है। वह अपने कामो में जग हित को लेते हुए सेवा करते हुए सब मंगल हेतु करता है। वह हर किसी के सुख दुख का ध्यान रखते हुए जीवन जीता है। वह किसी का अहित कार्य नही करता।
जो व्यक्ति जीने की कला से अनभिज्ञ होता है उसके जीवन मे केवल भोग होता है, योग नही। केवल स्वार्थ होता है, उसके जीवन मे नीरसता होती है। मौज मस्ती शोक जीवन का सच्चा मज़ा नही, जीवन जीने की कला जहां आ गयी, वहां भोग पर स्वतः नियंत्रण लग जाता है। तन का श्रृंगार तो तुम रोज़ किया करते हो, लेकिन अपने को मन के श्रृंगार करने में लगा दोगे तो जीवन जीने की कला आ जाएगी। जिसने जीवन जीने की कला आ गयी वह समय, शक्ति,व साधनो का दुरुपयोग बर्दाश्त नही करता।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी

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