किसी की आस्था को ठगना अपनी आस्था को ठगना है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज

धर्म

किसी की आस्था को ठगना अपनी आस्था को ठगना है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

रामगंजमंडी 

परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने उपगुहन अंग पर प्रकाश डाला उन्होंने इसका अर्थ बताया ढकना भावार्थ रूप में समझाते हुए कहा कि किसी अज्ञानता के कारण किसी धर्मात्मा का अवगुण आपकी दृष्टि में आ जाए तो उसे ढकना चाहिए लेकिन हमारी आदत तो उसे फैलाने की है, जब तक अवगुण हम लोगों को नहीं कह देते है तब तक चैन भी नहीं पड़ती है। उन्होंने कहा लोग दूसरे के दोषों को ऐसे कहते हैं जैसे उस समय अमृत का पान कर रहे हों। बुराई बहुत जोर-जोर से करेगा इसके विपरीत कोई व्यक्ति दूसरों के गुणों का गुणगान करेगा तो बहुत धीरे से करेगा। इस बात पर ध्यान दिलाया कि धर्मात्मा का यदि दोष आपके सामने आ जाए तो पहले उसे वही का वही दबा दो और उसे ढक दो। उन्होंने कहा ऐसा भी सत्य मत बोलो किसी के प्राण संकट में आ जाए और धर्म और धर्मात्मा को परेशान ना करें। और उससे धर्म कलंकित हो जाए। लोग धर्म से आस्था घटा ले ऐसा भी सत्य नही बोलना चाहिए। और वह झूठ सत्य से भी बड़ा होता है। 

 

 

प्राणों से ज्यादा धर्म का संरक्षण करना चाहिए। प्राण चले जाए कोई बात नहीं धर्म नहीं जाना चाहिए। धर्म का संरक्षण धर्मात्मा संरक्षण करना प्रत्येक जैनी का दायित्व है।

      

  आचार्य श्री ने आस्था को ठगने के विषय में कहा की किसी की आस्था को ठगना अपनी आस्था को ठगना है अपने आप को नरक निगोद भेजना है अनंत काल के लिए अपने आपको कष्ट पीड़ा में तैयार करना है। धर्मात्मा व्यक्ति किसी को ठग नहीं सकता क्योंकि वह अच्छी तरह से समझता है ठगने का अर्थ क्या है ठगने का फल क्या है वह अच्छी तरह से समझता है। लेकिन धर्मात्मा सहज में ठग जाते हैं, समझ ही नहीं पाते हैं। ठगना अच्छी बात नहीं है स्वयं को न दूसरों को अगर दूसरे को ठग रहे हो तो समझ लो तो उस समय तुम समझ लो उस समय तुम अपने आप को ठग रहे हो। व्यक्ति की रक्षा करना अनिवार्य नहीं है लेकिन धर्म की रक्षा करना अनिवार्य है। धर्म की रक्षा से ही हमारा धर्म सुरक्षित रहता है।

 

उन्होंने कहा दिमाग मत लगाओ किसी की भूल में किसी की चुक में आपके सामने किसी ने रात्रि भोजन का त्याग किया भूल से उसे ध्यान नहीं रहा और आपके सामने रात्रि भोजन करते पाया गया तब चार लोगों को बुलाकर मत कहो दिमाग मत लगाओ दिल लगाओ हो सकता है भूल गया हो हो सकता है ध्यान नही रहा हो हो सकता है भाव बदल गया हो समझाओ बात करो उससे एकांत में ले जाकर पहले तो ढक दो उसके बाद ऐसा उपक्रम करो की वह पुनः स्थापित हो।

 

 

लोग गड्ढा दूसरे के लिए खोदते है लेकिन बाद में खुद उसी में गिर जाते हैं। अग्नि का गोला किसी को मारने के लिए उठाओगे तो पहले कोन जलेगा स्वयं जलेगे। ऐसे ही अगर आपने धर्मात्मा की बात को ढका नहीं आपको इतनी हानि उठानी पड़ेगी आप अनंत भवों तक सुलझ नहीं पाओगे।

 

अच्छा तो यह है इसी भव में सुलझने का प्रयास करो और उपगुहन अंग को धारण करो ताकि आत्मा का कल्याण हो सके। 

      अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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