इच्छा का निरोध ही तप है आर्यिका विज्ञा श्री

धर्म

व्रत उपवास करने वाले तपस्वियों के सम्मान पर विनतियो का हुआ आयोजन

इच्छा का निरोध ही तप है
आर्यिका विज्ञा श्री

निवाई

 

 

पर्युषण पर्व के चलते शहर के सभी जैन जिनालयों मे भाद्रपद मास के तहत अनेक धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए जिसमें मंगलवार को सभी जैन मंदिरों में दशलक्षण धर्म में अभिषेक शांतिधारा के साथ उत्तम तप धर्म की विशेष पूजा अर्चना की गई। जैन समाज के प्रवक्ता विमल जौंला व राकेश संधी ने बताया कि मंगलवार को बिचला जैन मंदिर में फेंसी डेस प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसमें विजेताओं को पुरस्कृत किया गया। प्रतीक जैन एवं विमल जौंला ने बताया कि अग्रवाल जैन मंदिर में पार्सल गेम्स प्रतियोगिता की गई जिसमें सेकडों लोगों ने भाग लिया। जौंला ने बताया कि दशलक्षण धर्म के चलते जैन धर्म में तप एवं त्याग धर्म का भी अत्यंत महत्वपूर्ण धर्म है। मंगलवार को अग्रवाल जैन मंदिर में व्रत उपवास करने वाले तपस्वियों के लिए भजन कीर्तन के साथ महिलाओं द्वारा विनतियो का आयोजन किया गया जिसमें महिलाओं ने 16 दिन के उपवास कर रहे गिरीश जैन की अनुमोदना करने के लिए विनतियां गाई गई जिसमें सैकडों महिलाएं मौजूद थी। इस अवसर पर आर्यिका विज्ञा श्री माताजी ने सभी श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि तप के बिना संसार का नाश संभव नहीं है कर्मो के क्षय की भावना से जो साधना की जाती है वह तप हैं बाकी सब दिखावा है आज तपस्या के नाम पर कई लोग मात्र तन सुखा रहे हैं वह तप नहीं है कुतप हैं| जिस प्रकार पृथ्वी को बिना खोदे पानी नहीं निकाला जा सकता, स्वर्ण को तपाये बिना चमक नही लायी जा सकती है कमल को सूर्य की किरण दिखायें बिना खिलाया नही जा सकता, उसी प्रकार बिना तपस्या के मुक्ति को नहीं पाया जा सकता | संसार में सभी को किसी भी सफलता को पाने के लिए तपना अवश्य पडता है | व्यापारी दुकान में धण्टों तक तप करता है शिक्षक स्कूल में तप करता है वकील कचहरी में तप करता डॉक्टर हॉस्पिटल में तप करता है वैज्ञानिक प्रयोगशाला में तप करता है , ड्राइवर गाड़ी में तप करता है उधोगपति फैक्ट्री में तप करता है महिलायें चौके में तप करती हैं , ये सभी अपने अपने उद्देश्य पूर्ति के लिए तप करते यह सम्यक तप नहीं कुतप कहलाता है | ये तप भौतिक सम्पदा तो दे सकते है , पर आत्मिक सम्पदा नही दे सकते | आर्यिका विज्ञा श्री माताजी मंगलवार को सुबह अग्रवाल जैन मंदिर में धर्म सभा को सम्बोधित कर रही थी उन्होंने कहा कि साधनो का मार्ग सुख सुविधा का मार्ग और साधना का मार्ग स्वतंत्रत स्वाधीन तपश्चर्या का मार्ग है भारतीय संस्कृति ने धर्म के लिए साधन सम्पन्न नही साधना सम्पन्न निरूपित किया है| तप दोषों की निवृत्ति करता है | आत्म शुद्धि का मार्ग है तप अग्नि में तपने पर ही स्वर्ण में शुद्धता आती है बल्कि सोने की कीमत से ज्यादा कीमत सोने की भस्म पर भोजन स्वादिष्ट हो जाता है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *