आत्मविश्वास

धर्म

आत्मविश्वास
इसरी का वर्षायोग पूर्ण हुआ आचार्य गुरुवर ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन कार्तिक पूर्णिमा के दिन कलकता मे प्रतिवर्ष होने वाले प्रभु पार्श्वनाथ उत्सव मे जाने का मन बना लिया लेकिन हमेशा अपने अतिथि स्वभाव के अनुरूप किसी को भी बिना.बताये कलकता की और चल पडे! लोगो मे तरह तरह की चर्चा होने लगी! मार्ग दुर्गम है! मार्ग मे श्रावको के घर भी नहीं है ! बड़ा अशांत क्षेत्र है ! बंगाल के लोग कैसा आचरण करेगे ! गुरुवर को नहीं जाना चाहिये !
एक दिन कलकता के श्रावक जन आये ! बडे विनम्र भाव से निवेदन किया की “बंगाल सुरक्षित प्रदेश नहीं है! आप पधारे ऐसी हम सभी की भावना है लेकिन भय भी लगता है”! आचार्य गुरुवर हमेशा की तरह मंद मंद मुस्कान दी और अभय मुद्रा मे हाथ उठाकर आशीष दिया और आगे बड गये !
यात्रा अनवरत चलती रही देखते ही देखते 350 km की दूरी दस दिन मे पूर्ण हो गयी! 11 वे दिन आचार्य संघ ने जब कलकता मे प्रवेश किया तब हजारो की संख्या मे भक्तो ने उनके द्रढ संकल्प के आगे मस्तक झुका कर खडे थे! इसी दिन वह महानगर महाव्रती दिगंबर जैन आचार्य की चरण धूलि पाकर धन्य हो गया!
विशाल मंदिर बेलगछीया तक हजारो लोगो के बीच उनका सहज भाव से गुजरना आम आदमी के लिये एक अदभुत घटना थी! देखने वालो ने उस दिन कहा की बेशकीमती साजो -सामान और विशाल शोभायात्रा के बीच अनेक श्रमणो से परिवेष्टित जैनों के एक महान गुरु आचार्य के दर्शन कर हम धन्य हो गये! उस दिन रास्ते मे खडे लोगो और घरो की खुली खिड़कियों से झाकती हजारो नैनो ने बलाक्वत यथाजात निर्ग्रन्थ श्रमण के पवित्र सोंदर्य को देखकर और कुछ भी देखने से इंकार कर दिया!
सचमुच विद्या-रथ पर आरुढ होकर ख्याति पूजा लाभ आदि समस्त मनोरथो को रोककर जो श्रमण भगवंत विचरण करते है उनके द्रढ -संकल्प से धर्म -प्रभावना सहज ही होती रहती है!
कलकता (1983}
आत्मानवेषी
मुनि श्री क्षमासागर महाराज
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी

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