रक्षाबंधन पर्व का प्राचीन नाम वात्सल्य पर्व है कनकनंदी गुरुदेव
भीलूड़ा
अभिनव श्रुत केवली वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि रक्षाबंधन पर्व का प्राचीन नाम वात्सल्य पर्व है। विष्णु कुमार मुनि ने वात्सल्य भाव से ओतप्रोत होकर 500 मुनिराज जिन पर बलिराजा द्वारा उपसर्ग हो रहा था उनको बचाया। साधुओं की रक्षा के लिए उन्होंने अपना साधु वेश छोड़कर वामन रूप धारण किया। बलीराजा तथा चार मंत्रीयो ने साधुओं से शास्त्रार्थ में हार जाने के कारण बदला लेने की भावना से उन पर यज्ञ के नाम पर उपसर्ग किया। संम्यकदर्शन, स्वाध्याय तथा सोलहकारण भावना के अंतिम में वात्सल्य तथा प्रभावना भावना आती है। धर्मो प्रदेश तथा प्रभावना अंग वात्सल्य अंग के बिना नहीं हो सकते। गुरुवाणी भावों को distal अर्थात शुद्ध करने के लिए होती है। प्रकृष्ट भावना का अर्थ प्रभावना है। जिसकी भावना पवित्र है वह द्वेष घृणा से रहित होकर प्रभावना कर सकता है।
उन्होंने कहा पहले आत्मउद्धार करो, फिर परोपकार करो। क्योंकि जो स्वयं प्रकाश नहीं है वह अन्य को प्रकाशित कैसे कर सकता है।जो संकीर्ण स्वार्थी होता है वह केवल परिवार के लिए ही सोचता है। परंतु जो परोपकारी होता है वह किसी को भी कष्ट नहीं देता। हर जीव में जिनेंद्र के दर्शन करता है। अतः वह आतंकवादी दुष्ट दुर्जन पापी नहीं हो सकता। जिस प्रकार ब्लैक होल अन्य को प्रकाशित नहीं कर सकता वैसे ही स्वार्थी अन्य जीव का कल्याण नहीं कर सकता। दान तथा पूजा स्वार्थ लोकप्रियता वर्चस्व प्रसिद्धि दूसरों को नीचा दिखाने के लिए करते हैं तो वह प्रभावना नहीं है ।धार्मिक जनों से वात्सल्य होगा तब ही धार्मिक बन सकते हैं। अनवरत अहिंसामय ,परस्पर में प्रेम, परम जीव दया ,हर जिनके प्रति दया वात्सल्य के लक्षण है। समय का अर्थ आत्मा, जिनवाणी, सिद्धांत आदि है। वात्सल्य भाव से आत्मा का स्वभाव प्रकट होता है। विश्व कल्याण की भावना ही प्रायोगिक अहिंसा है। गुरु शिष्य के दोष जाने बिना आध्यात्मिक रोग को दूर नहीं कर सकते।
विजयलक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
