प्रमुख सागर महाराज ने रक्षाबंधन को प्रेम का प्रतीक बनाते हुए इसकी पवित्रता को बनाए रखने का सन्देश दिया
पारसनाथ
पूज्य आचार्य प्रवर 108 प्रमुखसागर महाराज ने रक्षाबंधन को वात्सल्य व प्रेम का प्रतीक बताया उन्होने जोर देते हुए कहा की हाथों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने वाले गांठ से ज्यादा महत्वपूर्ण होते जो गांठ आत्मा के भीतर बांधे जाते हैं। मधुबन के प्रवचन सभागार में श्रोताओं के बीच धर्म उपदेश देते हुए आचार्य भगवंत प्रमुख सागर जी महाराज ने जैन धरम के अनुसार रक्षाबंधन का महत्व बताते हुए कहा कि जैन आगम में आज के दिन 700 दिगंबर मुनियों पर से उपसर्ग दूर हुआ। राजाओं ने एक रक्षा सूत्र धागा पिच्छी पर बांध कर संकल्प लिया कि हम धर्मगुरुओं की रक्षा करेंगे और हुमायूं के पास चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णावती ने भेजा तो हुमायूं राजा ने चित्तौड़ की रक्षा की।
मुस्लिमों का भी उसने सिकंदर के हाथ में पोरस राजा के हाथ में राखी बांधी तो सिकंदर अपनी बहन की शान की रक्षा में खड़ा हो गया। महाराज श्री ने उपस्थित श्रावकों को धर्म उपदेश देते हुए कहा कि द्रौपदी ने कृष्ण के हाथ में चोट लगने पर कृष्ण के हाथ में अपनी साड़ी को फाड़कर कृष्ण के हाथ में बांध दी, तो कृष्ण ने चीर हरण के समय द्रौपदी की रक्षा साड़ी बढ़ाकर की। उसने अपना फर्ज द्रौपदी की साड़ी को बढ़ाकर उतारा। आज का यह पर्व भाई बहन की रक्षा के साथ-साथ संकल्प का पर्व है।

भाई बहन से राखी बंधवाते समय यह संकल्प लें कि वो पत्नी को छोड़कर संसार की सारी नारी को स्वयं की मां बहन बेटी मानें और उनकी सुरक्षा करें। बहन भाई की कलाई पर रखी बांधते समय पवित्र भावना मन में रखें कि मेरे भाई का चरित्र बहुत पावन पवित्र है, उसके मन में कभी गलत विचार ना आए। कहा कि रक्षाबंधन प्रेम का पर्व भी है, इसमें पैसों की कोई महत्व नहीं है। सिर्फ रक्षासूत्र व तिलक ही काफी है। लिहाजा इसे दिखावा के लिए नहीं बल्कि पवित्र भावना से मनाएं।
संकलन अभिषेक जैन लूहाडीया रामगंजमंडी
