जीव जब तक इन तीन प्रश्नों का समाधान नहीं करेगा तब तक उद्धार संभव नहीं हैं। वह प्रश्न हैं मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और मुझे कहां जाना है। आर्यिका श्री आराध्यमति मति माताजी

धर्म

जीव जब तक‎ इन तीन प्रश्नों का समाधान नहीं करेगा तब तक‎ उद्धार संभव नहीं हैं। वह प्रश्न हैं मैं कौन हूं, कहां‎ से आया हूं और मुझे कहां जाना है। आर्यिका श्री आराध्यमति माताजी

शाढोरा

पूज्या आर्यिका 105 श्री आराध्यमति माताजी ने अपने मांगलिक उद्बोधन मे स्थानीय पार्श्वनाथ मंदिर में मंगलवार को चल रही‎ छहढाला का अध्यन कराते हुए कहा की यह जीव जब तक‎ इन तीन प्रश्नों का समाधान नहीं करेगा तब तक‎ उद्धार संभव नहीं हैं। वह प्रश्न हैं मैं कौन हूं, कहां‎ से आया हूं और मुझे कहां जाना है। इनका‎ समाधान है मैं ज्ञान स्वभावी आत्मा हूं, नरक‎ तिर्यंच आदि गतियों से आया हूं लेकिन यह मेरा‎ ठिकाना नहीं है मेरा ठिकाना तो मोक्ष है जहां मुझे‎ जाना है। तिर्यंच गति के दुखों का वर्णन करते हुए‎ माताजी ने बताया कि एक श्वास लेने के समय‎ मात्र में अठारह बार जन्म और अठारह बार मरण‎ करते हुए इस जीव ने अनंत काल तक निगोद‎ पर्याय में समय बिताया है। वहां से निकल कर भी‎ यह जीव एक इंद्रिय की पर्याय में पृथ्वी काय, जल‎ काय, वायु काय, अग्निकाय और वनस्पति काय में‎ जन्म और मरण करता हुआ दुखों को सहन करता‎ है। दुर्लभता से प्राप्त त्रस पर्याय में भी लट,‎ पीपीलिका, चींटी, भौंरा आदि दो इंद्रिय, तीन‎ इंद्रिय, चार इंद्रिय पर्यायों में जन्म लेकर भी दुख‎ सहन करता रहता है। इस प्रकार यह प्राणी अनंत‎ दुखों को सहन करता हुआ संसार में भ्रमण करता‎ रहता है। इनसे बचने के लिए हमें बड़ी दुर्लभता से‎ मिले इस मनुष्य जन्म में समीचीन पुरषार्थ करना है‎ तभी हमारा कल्याण हो सकेगा।‎

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

 

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