निमित्त
जिनेद्र वर्णी ने अंत समय मे आचार्य महाराज को अपना गुरु मानकर उनके श्रीचरणों मे समाधी के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया था सल्लेख़ना अभी प्रारम्भ नहीं हुयी थी इससे पुर्व एक दिन अचानक संघ सहित आचार्य महाराज बिना कुछ कहे इसरी से नीमिया घाट होकर पार्श्वनाथ टोक की वंदना करने. को निकल पडे सारा दिन वंदना मे बीत गया इसरी -आश्रम आते आते शाम हो गयी
चुकी बिना किसी पुर्व सुचना के यह सब हुआ इसलिये वर्णी जी दिन भर चिंतित रहे की पता नहीं आचार्य महाराज कब लोटेगे जैसी ही इसरी आश्रम महाराज लोटकर आये वर्णी.जी उनके चरणों मे माथा रख दिया आँखों मे अश्रु भर आये अवरूद्ध कंठ से बोले की
“महाराज आप मुझे बिना बताये अकेला छोड़कर चले गये मन बहुत घबराया मुझे तो बस आपका ही सहारा है मेरे जीवन के अंतिम समय मे अब आपको ही संभालना है”
आचार्य महाराज क्षण भर को गंभीर हो गये फिर मुस्कुराकर बोले की “वर्णीजी सल्लेखना तो आत्माश्रित है अपने भावो की संभाल आपको स्वयं करनी है अपने उपादान को जाग्रत रखिये मे तो निमित मात्र हु”।




इसी तरह अपने प्रति समर्पित हर शिष्य को संभालना सहारा देना सयम के प्रति जाग्रत रखना और निरंतर आत्म कल्याण की शिक्षा देते रहना परन्तु स्वयं को असम्प्रक्त रहना यह उनकी विशेषता है
इसरी {1983}
क्षमासागर जी महाराज
पुस्तक आत्मानवेषी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
