हिंसात्मक शब्द बोलना ही अधर्म है सुप्रभसाग़र जी

धर्म

हिंसात्मक शब्द बोलना ही अधर्म है सुप्रभसाग़र जी
विदिशा
पूज्य मुनि श्री सुप्रभसाग़र जी महाराज ने अपने उदबोधन में कहा *”हिंसात्मक शव्द बोलना ही अधर्म है,तो सीधे सीधे हिंसा को धर्म मानना कंहा तक उचित है? जंहा पर राग है द्वेष है, क्या दूसरों को दुःख दैने से आपको सुख मिल सकता है?”उपरोक्त उदगार मुनि श्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने जैन भवन किरीमौहल्ला में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।*
मुनि श्री ने कहा कि हम भले ही हिंसा नहीं करते लेकिन अनजाने में ही सही यदि हमने हिंसात्मक शव्दों का प्रयोग कर लिया तो हमारा धर्म गया। मुनि श्री ने कहा कि यदि हमें वास्तविक धर्म को समझना है, तो हिंसा और हिंसात्मक शव्दों के प्रयोग को भी समझना होगा तभी हम धर्म के मर्म को समझ सकते है। उन्होंने कहा कि “हिंसा” कभी धर्म हो ही नहीं सकता” भाव हिंसा हो या द्रव्य हिंसा यदि धर्मस्थल पर आकर भी यदि आपकी कषाय नहीं गयी तो आपने अभी धर्म के मर्म को समझा ही नहीं, मुनि श्री ने कहा कि निमित्त कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो लेकिन अपने आपको यदि आपने संभाल लिया तो ही आप धर्मात्मा है। उन्होंने एक कथानक सुनाते हुये कहा कि एक मां द्वारा अपने बेटे को स्वपन के फल से बचने के लिये आटे के मुर्गा की बली देने की बात कही और बेटे ने मां की बात को मानते हुये उस स्थान पर जाकर आटे के मुर्गा की बली चढ़ाई। उस हिंसा के परिणाम स्वरुप सात जन्मों तक मां और बेटा दोनों को तिर्यंच की पर्याय भोगना पड़ी और कसाई के हाथ से वध को प्राप्त होंना पड़ा।
उन्होंने सभा को सम्बोधित करते हुये कहा कि हे मां आप अपने बच्चे से कितनी भी नाराज हो जाना लेकिन कभी भी हिंसात्मक शव्दों का प्रयोग और हिंसा करने की प्रेरणा मत देना। उन्होंने कहा कि भले ही उस समय आपने मर जा काहे को मेरी कोख में आया आदि शव्द कह कर संकल्पी हिंसा तो कर ली थी लेकिन उसका परिणाम आपको भोगना पड़ा। सभा को सम्बोधित करते हुये मुनि श्री ने कहा कि हिंसात्मक वस्तुओं से तैयार सौन्दर्य प्रसाधनों को लगाकर मंदिरों में आते हो विचार करना कि हम कितने अंशों में जैन है? और तो और जब लिपस्टिक और नैल पालिश लगाऐ हम मुनिराजों को आहार दैनै के लिये सामने आते हो ओर मन शुद्धि वचन शुद्धि और काय शुद्धि कहते हो? तो आप विचार कीजिए की काय की शुद्धि? हम लोगों को ऐसी महिलाओं को चौका से बाहर करना पड़ता है।
मुनि श्री ने कहा कि जब मात्र शव्दोंं की हिंसा ही अधर्म है तो जो साक्षात हिंसा को ही धर्म मानकर हिंसात्मक क्रिया कर रहे है वह धर्म कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि धर्म तो हमें अहिंसा,दया,करूणा,और वात्सलय करना सिखाता है,अहिंसा ही परम धर्म है। मुनि श्री ने कहा कि परद्रव्यों की हिंसा की बात तो छोड़ो खोटे बचन बोलना दूसरे के प्रति हिंसात्मक विचार मन में लाना भी हिंसा है। हे मां अपने भले ही मातृत्व प्रेम में आकर बच्चे को सुधारने की अपेक्षा से खोटे बचन बोले थे उसे “मरजा” “भाड़ में जा” शब्द कह दिया था लेकिन तात्कालिक गुस्से में जो शब्द आपने बच्चे से बोले वह शब्द आपके भी कर्म बन्ध में कारण बने, इसलिये किसी से भी खोटे वचनों को बोलने से पहले दस बार सोचना और समझना चाहिये।
मुनि श्री ने पं. दौलतराम जी की छहढाला की ढाल की विवेचना करते हुये कहा कि आप लोग देख लेना कि वर्ष वर्ष का अचार मुरब्बा खाकर आप अपने आपको कितना धर्मात्मा मानते हो?भक्ष्य अभक्ष्य पर चर्चा करते हुये कहा कि प्रतिदिन पूजन और अभिषेक कर रहे हो गुरु की वाणी भी सुन रहे हो फिर भी अभक्ष्य वस्तुओं का सेवन करते हो तो धर्म आपके जीवन में उतरा ही नहीं,”अनजाने में किया गया पाप तो क्षम्य है लेकिन जो पाप जानबुझकर किया जा रहा है वह क्षम्य नहीं होता”? मुनि श्री ने कहा कि धर्म अकेले क्रिया में ही नहीं आपके आचरण में भी झलकना चाहिये। इस अवसर पर मुनि श्री प्रणतसागर जी एवं मुनि श्री सौम्यसागर जी महाराज मंचासीन थे उन्होंने भी संबोधित किया। श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि मुनि संघ के प्रवचन प्रतिदिन 8:30 से चल रहे है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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