गुरुओं का समागम मिलना ही अध्यात्म का दर्शन है। पूर्णमति माताजी

धर्म

गुरुओं का समागम मिलना ही अध्यात्म का दर्शन है। पूर्णमति माताजी

इंदौर और मालवा में अपनी आत्मा का वास बताने वालीं पूर्णमति माताजी कहती हैं गुरुओं का समागम मिलना ही अध्यात्म का दर्शन है। लोगों को आत्मशुद्धि के लिए जीना चाहिए। दैनिक भास्कर ने उनसे चातुर्मास, संत, अध्यात्म आदि विषयों पर बात की। जो हम आपसे सांझा कर रहे है

 

कुशाग्र बुद्धि होने से 12 वर्ष का पाठ्यक्रम ढाई वर्ष में ही पूरा किया


आर्यिका पूर्णमति माता के दीक्षा के पहले के गुरु पं. रतनलाल शास्त्री कहते हैं आर्यिका पूर्णमति माताजी डूंगरपुर की थीं। वह बचपन से ब्रह्मचर्य का पालन कर साधना करती थीं। कुशाग्र बुद्धि होने से 10- 12 वर्ष का पाठ्यक्रम उन्होंने ढाई वर्ष में ही पूर्ण कर लिया। इसके बाद आचार्य भगवन ने उन्हें दो-ढाई साल जबलपुर के ब्रह्मचर्य आश्रम में रखा। दीक्षा भी हुई। भारत में विहार करते हुए उन्होंने अनेक शास्त्रों, विधानों की रचना की। वे विदुषी आर्यिका हैं। आचार्य संघ में 168 आर्यिकाएं हैं, जिनमें उनका उच्च स्थान है। उनके इंदौर आने पर बहुत खुशी है। जहां से उन्होंने धर्म की दीक्षा ली वहीं मंगल प्रवेश हो
{इंदौर से रिश्ते के बारे में बताएं?
– 33 साल दीक्षा लिए हो गए। 38 साल पहले इंदौर में थी। कंचनबाग स्थित समवशरण मंदिर में पं. रतनलाल शास्त्री अभ्यास कराते थे, वहीं से शास्त्र सीखा। मालवा मेरे लिए बहुत अच्छा रहा क्योंकि जनम-जनम के गुरु (आचार्य विद्यासागर महाराज) के प्रथम दर्शन यहीं हुए। मैं चार या पांच वर्ष की थी तब राजस्थान में आचार्य शिवसागर महाराज से मिली। तब उनका सानिध्य मिला। मैंने उन्हें भजन सुनाए तो उन्होंने कहा था ये बालिका दीक्षा लेगी। यह मेरा सौभाग्य रहा कि मेरे गुरु विद्यासागर महाराज, उनके गुरु आचार्य ज्ञानसागर महाराज और उनके भी गुरु आचार्य शिवसागर महाराज का मुझे सान्निध्य मिला। समय के दौर में सब कुछ बदलता रहता है।

{नई पीढ़ी और अध्यात्म के बारे में आपका क्या विचार हैं?
– गुरुओं का समागम मिलना ही अध्यात्म का दर्शन होना है। जिसने स्वयं को आत्मा मान लिया वही आध्यात्मिक। नई पीढ़ी अध्यात्म की ओर बहुत जल्दी अग्रसर होती है। अध्यात्म सीधा आत्मा में प्रवेश करता है। कैसी भी समस्या आए, अच्छा सोचो, आनंद से जियो, यही अध्यात्म है। अध्यात्म सबके लिए आनंददायी है।
{ चातुर्मास कैसे सार्थक होता है?
– चातुर्मास के चार महीनों में व्यवहार की वृद्धि, आचार-विचार और आत्मा की शुद्धि होती है। इन शुद्धियों को लेकर जन-जन में भाव आता है और चातुर्मास सार्थक हो जाता है। बाहर की प्रसिद्धि के लिए तो जीते ही हैं, आत्मशुद्धि के लिए भी जिएं।
{बदली परिस्थिति में क्या होना चाहिए?
– हर इंसान सुख चाहता है। जीवन का आखिरी उद्देश्य यही है कि उसे सुख मिले। संत कोशिश कर सकते हैं लेकिन द्वार तो आपको ही खोलना है। संत सत्संग में आने वाले इंसान को सुख से अवगत करा सकता है। कैसी भी परिस्थिति हो, संत हमेशा आनंदित रहते हैं।

दैनिक भास्कर से संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *