सम्यक दृष्टि ओजस्वी, तेजस्वी, विद्यावंत, वीर्यवान, यश, कीर्ति से संपन्न होते हैं। कनकनदी
योगेंद्रगिरी सागवाड़ा
सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने योगेंद्र गिरी क्षेत्र से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया की सम्यक दृष्टि ओजस्वी, तेजस्वी, विद्यावंत, वीर्यवान, यश, कीर्ति से संपन्न होते हैं। वह महाकुल में जन्म लेकर महा तिलक बनते हैं। सम्यक दृष्टि किसी से नहीं डरते उनमें आध्यात्मिक गुण प्रकट होते हैं। सम्यक दृष्टि सज्जन पुरुष अंतरंग मैं दया करुणा में मृदु सम्यक दर्शन, ज्ञान, चरित्र में वज्र से भी कठोर, ह्रदय में कोमल, परोपकार, सहजता, सरलता, सेवा से भरपूर होते हैं। महापुरुष साधना में कठोर होते हैं। मिथ्यात्व से परिपूर्ण लोग दूसरे क्या कहेंगे, दूसरे क्या सोचते हैं, क्या बोलते हैं उससे प्रभावित रहते हैं। 1 किलोमीटर के अंधेरे से छोटा सा दीपक कभी नहीं डरता। अनंत सुख, वैभव ,आनंद को देने वाला धर्म मानसिक सामाजिक शारीरिक बंधन से मुक्त करने वाला है। चारित्र मोहनीय का बंधन बड़ा बंधन हैं। परम सत्य परम आत्म तत्व का ज्ञान आत्मा से परमात्मा बनाने वाला हैं। भोग भूमि तथा स्वर्ग में द्रव्य मिथ्यात्व नहीं है परंतु भाव मिथ्यात्व हैं। सब धर्मों को साथ लेकर चलना सामाजिकता हैं। निगोदिया से लेकर पंचेेंद्रीय सभी जीवो को क्षमा करना, क्षमा मांगना महान धर्म हैं। पापों को जानाना आवश्यक है। उसे जानकर ही उसका त्याग कर सकते हैं। इसे स्वीकार नहीं करना, अनुमोदना नहीं करना। लौकिक व्यवहार को तीर्थंकरों ने भी गृहस्थ अवस्था में पालन किया परंतु लोकाचार को धर्म नहीं माना। शरीर की सुरक्षा के लिए तीर्थंकरों ने भी चतुर्थ काल में भी आहार लिया परंतु शरीर को मैं, मेरा, आत्म स्वरूप नहीं माना। मोक्ष के लिए उपाय रत्नत्रय, अहिंसा, 10 धर्म, क्षमा आदि हैं। अन्य रसायन रुपी उपाय शरीर के रोग को दूर कर सकते हैं। पुण्य की शक्ति के आगे अन्य कोई भौतिक शक्ति टिक नहीं सकती। अनुमोदना से पुण्य से क्षमता , योग्यता, समर्थता बढ़ती हैं। समता शांति आती है। वही इस बेला में धीरे-धीरे कविता द्वारा मुनि श्री सुविज्ञ सागर गुरुदेव ने मंगलाचरण किया। वही परतापुर से संजय जैन ने मोर गाव मे चातुर्मास के लिए निवेदन किया है
विजय लक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
