असफलता के हम स्वयं जिम्मेदार हैं और सफलता प्रभु के आशीर्वाद का प्रतिफल है ऐसा स्वीकार करना चाहिए।मुनि श्री
खुरई
पूज्य निर्यापक श्रमण संभवसागर महाराज संघ की ग्रीषम कालीन प्रवास प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर मे हो रहा है पूज्य मुनि श्री ने अपने उद्बोधन मे सफलता असफलता पर प्रकाश डाला उन्होने कहा यदि हमारे जीवन में जो भी सफलता अर्जित होती है या अच्छा कुछ होता है, उसे हमने प्राप्त किया ऐसा श्रेय स्वयं प्राप्त करना चाहते हैं और इसके विपरीत यदि हमअसफल हो जाते , कुछ बुरा घटित हो गया, जीवन में तो हम ईश्वर को दोष देने लग जाते हैं या ऐसा कहे तो हम भाग्य को कोसने लगते हैं। मुनि श्री ने कहा ऐसा नहीं होना चाहिए,जबकि इसकोईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार करना चाहिए। हम असफलता के हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं और सफलता प्रभु के आशीर्वाद का प्रतिफल होती है ऐसा स्वीकार करना चाहिए। ऐसा मानने पर हमारे अंदर कभी भी अभिमान पैदा नहीं होगा और ईश्वर के प्रति आस्था विश्वास और दृढ़ होता चला जाएगा। निर्यापक मुनिश्री संभव सागर महाराज ने आगे कहा जो कुछ भी हमारे जीवन में घटित हो रहा है वह अच्छा हो रहा है, ऐसा मानना चाहिए। ईश्वर कभी भी किसी का गलत नहीं कर सकता। वैसे भी ईश्वर हमें सुख-दुःख नहीं देता, बल्कि हमारा किया हुआ पूर्व कर्म ही हमें सुख-दुःख देता है। ईश्वर के प्रति विश्वास रखने से जीवन का वास्तविक अर्थ सिद्ध हो जाता है। कोई कितना भी बड़ा विद्वान क्यों न हो, किन्तु प्रभु व गुरू के सम्मान बिना उसकी विद्या अधूरी है। जो शाश्वत है, अनंत रूप है ऐसे ईश्वर से प्रेम करो।
संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
