अमेरिकी कांग्रेस में पहली बार जैन समाज को प्रतिनिधित्व; डॉ. अमीश शाह और पिया डांडिया विजयी!*

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अमेरिकी कांग्रेस में पहली बार जैन समाज को प्रतिनिधित्व; डॉ. अमीश शाह और पिया डांडिया विजयी!*

**वाशिंगटन | 6 नवंबर 2026**

अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में जैन समाज के लिए एक महत्वपूर्ण घटना सामने आई है। अमेरिकी संसद के प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) में पहली बार जैन धर्म से जुड़े भारतीय मूल के दो व्यक्तियों के निर्वाचित होने का दावा किया गया है। डॉ. अमीश शाह और पिया डांडिया की जीत से अमेरिका में जैन समाज को राष्ट्रीय राजनीति में प्रतिनिधित्व मिलने का एक नया मार्ग खुला है।

 

3 नवंबर 2026 को हुए अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार डॉ. अमीश शाह ने एरिजोना राज्य के प्रथम कांग्रेस निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। वे चिकित्सक हैं और इससे पहले एरिजोना राज्य विधानसभा के सदस्य रह चुके हैं। इस जीत के साथ उन्हें अमेरिकी कांग्रेस में निर्वाचित होने वाले पहले जैन-अमेरिकी के रूप में बताया गया है।

 

फ्लोरिडा राज्य के 22वें कांग्रेस निर्वाचन क्षेत्र से डेमोक्रेटिक पार्टी की पिया डांडिया ने विजय प्राप्त की। वे शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रही हैं और हाईस्कूल की प्राचार्य के रूप में भी कार्य कर चुकी हैं।
जयपुर के विख्यात जैन परिवार की बेटी पिया डांडिया जयपुर के एस एम‌ एस मेडीकल कालेज के प्रोफेसर शतायु डा. प्रेम चंद डांडिया की पोती हैं।

इन दोनों की जीत का अमेरिका के जैन समाज ने स्वागत किया है। वहां के जैन संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस घटना को ऐतिहासिक महत्व का बताया है।

उत्तर अमेरिका के जैन संगठनों की महासंघीय संस्था **फेडरेशन ऑफ जैन एसोसिएशंस इन नॉर्थ अमेरिका (JAINA)** के कार्यकारी निदेशक मनीष मेहता ने कहा कि अमीश और पिया के माध्यम से अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद जैसे जैन सिद्धांतों को अमेरिकी राजनीति में आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

अमेरिका में जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या लगभग 1.5 लाख होने का अनुमान अरिहंत इंस्टीट्यूट नामक संस्था ने व्यक्त किया है। जनसंख्या की दृष्टि से यह एक छोटा धार्मिक समुदाय है, लेकिन शिक्षा, चिकित्सा, तकनीक, उद्योग और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में जैन समाज ने उल्लेखनीय योगदान दिया है।

डॉ. अमीश शाह ने अपने राजनीतिक जीवन में पशु कल्याण के लिए कई कानून बनाने के प्रयास किए हैं। उन्होंने बिल्लियों के पंजों के नाखून शल्य चिकित्सा द्वारा हटाने तथा पिल्लों की बिक्री करने वाले अनैतिक प्रजनन केंद्रों पर प्रतिबंध लगाने संबंधी विधेयकों का समर्थन किया था। सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के मुद्दों पर भी उन्होंने काम किया है।

जैन धर्म के अहिंसा सिद्धांत के साथ उनके इन प्रयासों को जोड़कर देखा जाता है। वे स्वयं को आजीवन जैन जीवनशैली का पालन करने वाला और शाकाहारी बताते हैं।

अमेरिका के जैन समाज के लिए यह उपलब्धि केवल दो व्यक्तियों की चुनावी सफलता तक सीमित नहीं है। इससे अमेरिकी राष्ट्रीय राजनीति में जैन दर्शन, अहिंसा, सहिष्णुता और विविध दृष्टिकोणों के सम्मान को अधिक पहचान मिलने की संभावनाएं पैदा हुई हैं।

*जैन समाज के लिए इस घटना का महत्व*

अमेरिका में जैन समाज की जनसंख्या भले ही अपेक्षाकृत कम हो, लेकिन इस समाज ने शिक्षा, उद्योग, चिकित्सा सेवाओं, तकनीक और सामाजिक कार्यों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। अब राजनीतिक क्षेत्र में भी उसका प्रतिनिधित्व सामने आ रहा है।

 

जैन धर्म के अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद के तीन प्रमुख सिद्धांत केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक जीवन को भी नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं।

एक विशेष बात यह भी है कि जैन समाज के लोगों को केवल अपने समुदाय तक सीमित न रहकर व्यापक समाज के हित में राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में आगे आना चाहिए। इस घटना से यही प्रेरक संदेश मिलता है कि समाज की वैचारिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

 

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