सफलता की दौड़ में कहीं स्वयं को ही न खो दें – अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

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सफलता की दौड़ में कहीं स्वयं को ही न खो दें – अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

दूसरों से आगे निकलने की होड़ में सुख, शांति और परिवार को न भूलें; सफलता के साथ आत्मसंतोष भी जरूरी – आचार्य श्री

 (पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ)।

परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सानिध्य में व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ पुष्पगिरी तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। उनके पावन सानिध्य में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायी कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। इसी श्रृंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि जीवन में सफल होना अच्छी बात है, लेकिन सफलता प्राप्त करने की अंधी दौड़ में स्वयं को खो देना जीवन की सबसे बड़ी विफलता है।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि आज हर व्यक्ति किसी न किसी दौड़ में शामिल है। कोई धन के पीछे भाग रहा है तो कोई नाम, पद और प्रतिष्ठा के पीछे। सोशल मीडिया ने इस प्रतिस्पर्धा को और तेज कर दिया है। दूसरों की उपलब्धियां देखकर व्यक्ति को लगता है कि वह पीछे रह गया है। इसी तुलना और प्रतिस्पर्धा में वह अपनी वास्तविक पहचान, खुशियां और जीवन का आनंद भूलता जा रहा है।

सफलता की अंधी दौड़ में शांति न खोएं

आचार्य श्री ने कहा कि यह दौड़ ऐसी है जिसकी कोई अंतिम मंजिल नहीं है। एक लक्ष्य पूरा होते ही दूसरा लक्ष्य सामने आ जाता है। दस हजार रुपये की नौकरी मिलने पर पचास हजार की इच्छा होती है और पचास हजार मिलने पर एक लाख की चाह पैदा हो जाती है। इस निरंतर होड़ में व्यक्ति सोना, हंसना और परिवार के साथ समय बिताना तक भूल जाता है। याद रखिए, सफलता का अर्थ केवल ऊंचाइयों तक पहुंचना नहीं, बल्कि भीतर से शांत और संतुष्ट रहना भी है। यदि सफलता के कारण आपकी नींद और मन का सुकून छिन जाए तो ऐसी सफलता का क्या लाभ?

 

महत्वाकांक्षा के साथ धैर्य और संयम भी जरूरी

आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में बड़े सपने अवश्य देखने चाहिए, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए धैर्य, संयम और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। कोई भी व्यक्ति एक दिन में अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचता। रोज छोटे-छोटे कदम उठाने वाला व्यक्ति ही एक दिन बड़ी सफलता प्राप्त करता है। सोशल मीडिया की चमक-दमक देखकर बार-बार अपना रास्ता बदलना उचित नहीं है। अपने लक्ष्य पर विश्वास रखिए और प्रतिदिन पूरी निष्ठा से प्रयास करते रहिए। जो व्यक्ति धैर्य के साथ चलता है, वह जीवन में लंबी दूरी तय करता है।

दूसरों से तुलना नहीं, अपनी क्षमताओं को पहचानें

आचार्य श्री ने कहा कि आज के समय में तुलना करना व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है। किसी का वेतन अधिक है, किसी की गाड़ी बड़ी है तो किसी के सोशल मीडिया पर अधिक लाइक्स हैं। दूसरों से तुलना करने की आदत हमारी खुशियां छीन लेती है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशेषता और क्षमता होती है। किसी के पास बुद्धि की शक्ति है तो किसी के पास मधुर वाणी और सेवा का भाव। इसलिए दूसरों जैसा बनने की दौड़ में शामिल होने के बजाय अपनी प्रतिभा को पहचानें और स्वयं का श्रेष्ठ स्वरूप विकसित करें।

 

बाहरी सफलता के साथ आंतरिक शांति भी आवश्यक

आचार्य श्री ने कहा कि बाहरी सफलता धन, गाड़ी, बंगले और पद-प्रतिष्ठा से दिखाई देती है, जबकि आंतरिक सफलता मन के सुकून, अच्छी नींद और चेहरे की मुस्कान में दिखाई देती है। पैसा बिस्तर खरीद सकता है, लेकिन नींद नहीं। पद कुर्सी दे सकता है, लेकिन सच्चा सम्मान नहीं। इसलिए जीवन में बाहरी उपलब्धियों और आंतरिक शांति के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। दिनभर मेहनत करने के साथ अपने लिए, परिवार के लिए और आत्मचिंतन के लिए भी समय निकालना चाहिए।

 

मंजिल तक पहुंचें, लेकिन रास्ते में खुद को न खोएं

अपने प्रेरणादायी संदेश में आचार्य श्री ने कहा कि सफल होना है तो इतनी मेहनत अवश्य करें कि मंजिल मिल जाए, लेकिन इतनी अंधी दौड़ भी न लगाएं कि रास्ते में स्वयं ही कहीं पीछे छूट जाएं। जीवन के अंत में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि आपने दुनिया की कितनी उपलब्धियां हासिल कीं, यह नहीं, बल्कि यह कि क्या आपने अपने भीतर के इंसान को पहचाना? क्या आपने स्वयं को पाया? इसलिए सफलता के साथ संस्कार, संयम, संतोष और आत्मशांति को भी जीवन का हिस्सा बनाएं।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

उक्त जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद ने दी।

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