*जैसी हमारी दृष्टि होती है, वैसी ही हमारी सृष्टि बनती है। -मुनि श्री समता सागर*
कुण्डलपुर(दमोह)।”
संसार में ऐसा कोई विचार नहीं है जो सर्वथा गलत हो। प्रत्येक विचार को अनेकांत की दृष्टि से समझने की आवश्यकता है उपरोक्त उद्गार”निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने अनेकांतवाद के सिद्धांत को जीवन के व्यवहार से जोड़ते हुए कहे।
उन्होंने कहा कि किसी भी विचार को एकांत आग्रह के साथ प्रस्तुत करने पर वह गलत साबित हो सकता है,लेकिन दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए अपने अस्तित्व की स्वीकृति देना ही अनेकांत की वास्तविक भावना है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने कहा कि अनेकांत केवल दार्शनिक सिद्धांतों और शास्त्रों के रहस्यों को समझने का माध्यम नहीं है, बल्कि जीवन के व्यवहार में आने वाली समस्याओं का समाधान भी इसी सिद्धांत से संभव है।


हमें अपनी बात को ही सही मानने का आग्रह छोड़कर दूसरों के दृष्टिकोण को भी समझना चाहिए। उन्होंने एकांत और अनेकांत की चर्चा करते हुए कहा कि बाहर के वातावरण में अशांति और कोलाहल मिल सकती है, लेकिन वास्तविक शांति भीतर की स्थिरता और एकाग्रता में है। वातावरण का कोलाहल समाप्त होने के साथ विचारों का कोलाहल शांत होना भी आवश्यक है। *जब मन में विचारों की स्थिरता आती है, तभी आत्मा की शांति और निराकुलता का अनुभव होता है।* गुरुवर आचार्य श्री के दोहे “कर्तापन की गंध बिन, सदा करे कर्तव्य, स्वामीपन ऊपर धरे, ध्रुव पर हो मंतव्य।” की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को अपना कर्तव्य तो पूरी निष्ठा से करना चाहिए, लेकिन उसके भीतर कर्तृत्व का अहंकार नहीं आना चाहिए। मैंने किया,


मेरे बिना यह काम नहीं होता,मैं ही सब कुछ कर रहा हूं, इस प्रकार का भाव कर्तृत्व बुद्धि है। आध्यात्मिक दृष्टि से यही अज्ञान का कारण बनता है। कर्तव्य और कर्तृत्व में अंतर समझाते हुए उन्होंने कहा कि कर्तव्य हमारी जिम्मेदारी है,जबकि कर्तृत्व में अहंकार और अपेक्षाएं जुड़ जाती हैं। जब हम किसी के लिए कुछ करते हैं और सामने से धन्यवाद, सम्मान या प्रत्युत्तर की अपेक्षा रखते हैं, तब अपेक्षा पूरी नहीं होने पर मन में दुख और अशांति पैदा होती है। हमने इतना किया, लेकिन उन्होंने याद तक नहीं किया, फोन तक नहीं किया, इस प्रकार के विकल्प कर्तृत्व भाव के कारण ही उत्पन्न होते हैं। इसके विपरीत कर्तव्य निभाने वाला व्यक्ति अपना दायित्व पूरा करके निश्चिंत रहता है और किसी से प्रतिफल की अपेक्षा नहीं करता।


मुनि श्री ने निमित्त और उपादान के सिद्धांत को समझाते हुए कहा कि किसी भी कार्य की सफलता में केवल एक व्यक्ति का योगदान नहीं होता। उदाहरण देते हुये कहा कि एक शिक्षक सभी विद्यार्थियों को समान रूप से पढ़ाता है, लेकिन परिणाम सबके अलग-अलग आते हैं, कोई अच्छे अंक प्राप्त करता है तो कोई असफल हो जाता है तो इसका क्या कारण है? प्रत्येक विद्यार्थी का अपनी योग्यता और पुरुषार्थ है। शिक्षक, साधन और सुविधाएं निमित्त बनते हैं, जबकि कार्य की परिणति में उपादान की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने चश्मे का उदाहरण देते हुए समझाया कि आंखों की कमजोरी होने पर चश्मा पढ़ने में सहयोगी बनता है, लेकिन चश्मा उसी व्यक्ति के काम आता है जिसे अक्षरों का ज्ञान हो। इस प्रकार निमित्त की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता और न ही उसे सर्वकर्ता मान लेना उचित है।

मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को कर्तृत्व,भोक्तृत्व और स्वामित्व के भाव से ऊपर उठने की जरूरत है। कोई किसी का स्वामी नहीं है, *प्रत्येक जीव अपनी सत्ता और अपने परिणामों का स्वयं स्वामी है।* इसलिए अपना कर्तव्य करते हुए भी मन में अहंकार और अधिकार का भाव नहीं आना चाहिए।
आज की शिक्षित और युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अपने कार्यक्षेत्र और पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए भी धर्म की सही समझ प्राप्त की जा सकती है।अच्छी और सच्ची बात जहां से भी मिले, उसे सुनना और समझना चाहिए तथा संभव हो तो जीवन में उतारना चाहिए। उन्होंने कहा कि करना बाद में होता है, पहले समझना जरूरी है। जब किसी कार्य के प्रति सही समझ और अच्छा उद्देश्य बन जाता है, तब उसे करना आसान हो जाता है। हमारे विचार ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। *जैसी हमारी दृष्टि होती है, वैसी ही हमारी सृष्टि बनती है।* इसलिए जीवन में कुछ अच्छा करना है तो पहले अच्छे विचारों का निर्माण करें, सही दृष्टिकोण अपनाएं और अनेकांत की भावना के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करें।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
