2047 का भारत कैसा हो? विकसित राष्ट्र के साथ विकसित चेतना वाला मनुष्य भी जरूरी – अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
तकनीक के साथ संस्कार, विकास के साथ करुणा और शिक्षा के साथ नैतिकता ही बनाएगी भारत को सच्चे अर्थों में विकसित राष्ट्र
औरंगाबाद/सोनकच्छ।
भारत वर्ष 2047 में अपनी आजादी के 100 वर्ष पूर्ण करेगा। देश को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प आज प्रत्येक भारतीय के मन में है, लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों, आधुनिक तकनीक और बढ़ती अर्थव्यवस्था से विकसित बनेगा, या इसके साथ विकसित चेतना, श्रेष्ठ विचारों और संस्कारवान मनुष्यों का निर्माण भी होगा? यह विचार व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में व्यक्त किए।
पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सानिध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। उनके सानिध्य में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। इसी क्रम में गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने 2047 के भारत की कल्पना प्रस्तुत करते हुए कहा कि देश का विकास केवल भौतिक समृद्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रत्येक नागरिक के व्यक्तित्व, विचारों और चरित्र में भी विकास दिखाई देना चाहिए।


कैसा हो 2047 का युवा?
आचार्य श्री ने कहा कि 2047 का युवा केवल तकनीकी ज्ञान और करियर में दक्ष न हो, बल्कि उसके भीतर करुणा, संवेदनशीलता और संस्कार भी हों। वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करना जानता हो, तो भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान का महत्व भी समझता हो। आधुनिकता अपनाने में उसे संकोच न हो, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपराओं पर गर्व भी हो।

शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, अच्छा इंसान बनाना हो
उन्होंने कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें केवल अंक और डिग्रियां ही महत्वपूर्ण न हों, बल्कि नैतिक मूल्य, अनुशासन और मानवीय संवेदनाएं भी प्राथमिकता पाएं। बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर और अधिकारी बनने के साथ-साथ एक अच्छा इंसान बनना भी सीखे। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन को श्रेष्ठ बनाना होना चाहिए।


परिवार में आधुनिकता के साथ संस्कार भी जरूरी
आचार्य श्री ने परिवार व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 2047 में परिवार छोटे हो सकते हैं, लेकिन दिल छोटे नहीं होने चाहिए। बुजुर्गों को वृद्धाश्रम की नहीं, परिवार के आंगन में सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता है। बच्चे माता-पिता से केवल आर्थिक जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि प्रेम, संवाद और आत्मीयता के लिए भी जुड़ें। परिवार की असली संपत्ति धन-दौलत नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और संस्कार हैं।
आर्थिक विकास का लाभ गांव और किसान तक पहुंचे
उन्होंने कहा कि ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण होना चाहिए, जिसमें अमीर और गरीब के बीच की दूरी कम हो। किसान को भी उसके परिश्रम का उचित मूल्य मिले। विकास का लाभ केवल महानगरों और बड़े उद्योगों तक सीमित न रहकर गांवों और सामान्य नागरिकों तक पहुंचे। वास्तविक विकास वही है, जिसमें समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में भी खुशहाली आए।


जाति नहीं, योग्यता और इंसानियत बने पहचान
आचार्य श्री ने सामाजिक व्यवस्था पर कहा कि समाज में व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसकी योग्यता, कर्म और चरित्र से होनी चाहिए। बेटियों और महिलाओं को ऐसा सुरक्षित वातावरण मिले, जहां वे दिन हो या रात, निर्भय होकर जीवन जी सकें। धर्म के नाम पर विवाद और संघर्ष नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव और उत्सव की भावना होनी चाहिए।
प्रकृति के बिना विकास अधूरा
उन्होंने पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता बताते हुए कहा कि विकसित भारत ऐसा होना चाहिए, जहां आधुनिक वाहन और सुविधाएं तो हों, लेकिन शुद्ध हवा और स्वच्छ पानी भी उपलब्ध हो। नदियां जीवनदायिनी बनी रहें, प्रदूषण का स्रोत न बनें। प्रत्येक गांव और शहर में हरियाली हो। विकास की दौड़ में प्रकृति का विनाश नहीं होना चाहिए।
ईमानदारी कमजोरी नहीं, सबसे बड़ी ताकत बने
आचार्य श्री ने नैतिक मूल्यों पर जोर देते हुए कहा कि ऐसा समाज बनाना होगा, जहां ईमानदारी को मूर्खता नहीं, बल्कि सबसे बड़ा गुण माना जाए। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी को चतुराई नहीं, बल्कि शर्मिंदगी समझा जाए। व्यक्ति का चरित्र ही उसकी वास्तविक पहचान बने।
तकनीक के साथ संस्कार और विकास के साथ करुणा जरूरी
आचार्य श्री ने कहा कि 2047 में हर हाथ में मोबाइल होगा, लेकिन हर व्यक्ति के भीतर विवेक भी होना चाहिए। तकनीक शरीर है और संस्कार उसकी आत्मा हैं। संस्कारों के बिना तकनीक का विकास अधूरा है। इसी प्रकार विकास के साथ करुणा का होना भी आवश्यक है। यदि विकास में मानवीय संवेदना नहीं है, तो वह कल्याणकारी नहीं हो सकता। भारत ऐसा बने, जहां बुलेट ट्रेन भी दौड़े और सामान्य व्यक्ति के जीवन, साधनों तथा सम्मान का भी पूरा ध्यान रखा जाए।
ऊंची इमारतों से नहीं, ऊंचे विचारों से बनेगी भारत की पहचान
अंतर्मना आचार्य श्री ने संदेश देते हुए कहा कि 2047 का भारत तभी सच्चे अर्थों में विकसित राष्ट्र कहलाएगा, जब यहां का मनुष्य विचारों में श्रेष्ठ, चरित्र में दृढ़, संस्कारों में समृद्ध और हृदय से करुणामय होगा। राष्ट्र की वास्तविक पहचान उसकी ऊंची इमारतों और आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले जागृत चेतना, उत्तम संस्कार और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण नागरिकों से होती है। हमें केवल विकसित भारत का सपना नहीं देखना है, बल्कि विकसित मनुष्य और संस्कारवान समाज के निर्माण का संकल्प भी लेना है।
प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
