*”माता-पिता की सेवा और बच्चों को संस्कार देना ही परिवार की सबसे बड़ी पूंजी -“राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर*
श्री सम्मेदशिखर (गिरिडीह)।
परिवार की वास्तविक समृद्धि धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि संस्कारों, आपसी प्रेम, आत्मीयता और माता-पिता के सम्मान से होती है। आज की पीढ़ी अपने बच्चों की परवरिश को लेकर जितनी सजग है, उतनी ही सजगता उसे अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यों के निर्वहन में भी दिखानी चाहिए उपरोक्त उद्गार राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने शंका समाधान में नई पीढ़ी की माताओं, बच्चों की परवरिश, माता-पिता की सेवा और परिवारों में बदलते संस्कारों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर में व्यक्त किये।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि महाराज श्री ने डेढ़ माह पहले मां बनी एक युवती के प्रश्न पर कहा कि मातृत्व जीवन का सबसे सौभाग्यशाली क्षण है। प्रत्येक मां को अपने भाग्य की सराहना करनी चाहिए कि उसे मातृत्व का गौरव प्राप्त हुआ है। बच्चे का लालन-पालन पूर्ण भाव विशुद्धि के साथ करें और अपने संस्कारों के साथ बच्चे के संस्कारों का भी ध्यान रखें।

उन्होंने सभी नई माताओं से कहा कि आपने भावनायोग का अभ्यास किया है,अब भावनायोग को अपने बच्चे की लोरी बना दीजिए। उन्होंने कहा कि आजकल की आधुनिक पीढ़ी हर बात के लिए यूट्यूब और एआई का सहारा लेने लगी है। तकनीक का उपयोग करना गलत नहीं है,लेकिन परंपरागत अनुभवों और बुजुर्गों की सीख को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है। परिवार की बुजुर्ग माताओं के पास बच्चों की देखभाल के वर्षों के अनेक अनुभव होते हैं। नई माताओं को उनका मार्गदर्शन लेना चाहिए और बुजुर्गों को भी वर्तमान समय की परिस्थितियों को समझकर ही सलाह देनी चाहिए।
मुनि श्री ने कहा बच्चों को अच्छा खानपान, उत्तम संस्कार और अच्छा वातावरण दें। तकनीक का उपयोग उनके बौद्धिक, मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए करें तथा उन्हें भीतर से मजबूत बनाएं। नई और पुरानी पीढ़ी परस्पर सम्मान और तालमेल से चले तो बच्चों का भविष्य बेहतर बन सकता है।
उन्होंने
माता-पिता की उपेक्षा करने वाली संतानों के संबंध में कहा कि जिस देश में मातृ देवो भव और पितृ देवो भव की परंपरा रही है, वहां जन्मदाता, जीवनदाता और संस्कारदाता माता-पिता अपनी ही संतानों की उपेक्षा के पात्र बनें, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रत्येक संतान को विचार करना चाहिए कि आज मैं जो कुछ भी हूं, किसके कारण हूं? मुझे जन्म किसने दिया, जीवन किसने दिया और योग्य बनाने के लिए संस्कार किसने दिए? माता-पिता के उपकारों का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता।



शास्त्रों में माता-पिता, जीविका देने वाले और गुरु के उपकारों को महत्वपूर्ण बताया गया है। बचपन में माता-पिता ने कदम-कदम पर हमारी रक्षा की। मां ने हर संकट में संभाला और पिता ने हर खतरे से बचाया। इसलिए वृद्धावस्था में उनकी सेवा करना संतान का परम कर्तव्य है।


महाराज श्री ने एक मार्मिक प्रसंग सुनाया कि एक युवक पत्नी के दबाव में अपने पिता को वृद्धाश्रम छोड़ने जा रहा था। रास्ते में पिता से पूछा कि पिताजी, आप मुझसे कुछ कहना चाहेंगे? पिता ने कहा कि बेटा, मैं सोच रहा हूं कि यदि तीस वर्ष पहले तुझे अनाथ आश्रम में छोड़ दिया होता तो आज मुझे वृद्धाश्रम का मुंह नहीं देखना पड़ता। पिता की बात सुनकर बेटे की आंखें खुल गईं। वह चरणों में गिर पड़ा और उन्हें घर वापस ले आया। उन्होंने कहा कि माता-पिता का महत्व अक्सर उनके चले जाने के बाद समझ में आता है, जबकि उनके रहते हुए ही उनके प्रति प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए।उन्होंने कहा कि आज आप अपने माता-पिता के साथ जैसा व्यवहार करेंगे, आने वाली पीढ़ी भी आपके साथ वैसा ही व्यवहार करेगी। पीढ़ियां वही संस्कार दोहराती हैं, जो वे अपने परिवार में देखती हैं। उन्होंने एक ऐसे परिवार का उदाहरण दिया, जहां 82 वर्ष के पिता का बेटा प्रतिदिन उनके पैरों की मालिश करता है। बेटे ने बताया कि उसने अपने पिता को भी अपने दादा की सेवा करते देखा था, इसलिए यह उसके जीवन का संस्कार बन गया। उसकी दोनों बेटियां भी प्रतिदिन उसके पैर दबाए बिना नहीं सोतीं। महाराज श्री ने नवयुवतियों को प्रेरित करते हुए कहा कि यदि आप श्रवण कुमार जैसी संतान चाहती हैं तो पहले अपने पति को श्रवण कुमार बनने की प्रेरणा दें। जिस घर में माता-पिता की सेवा के संस्कार होंगे, उसी घर में अगली पीढ़ी भी उनका अनुसरण करेगी।


वृद्ध माता-पिता को भी उन्होंने संदेश दिया कि संतानों से अत्यधिक अपेक्षाएं न रखें। यदि संतान उपेक्षा या तिरस्कार करे तो मोह और आसक्ति में बंधकर स्वयं को दुखी न बनाएं। वृद्धावस्था को आत्मकल्याण का अवसर बनाएं और आत्मसम्मान के साथ आध्यात्मिक जीवन की ओर आगे बढ़ें।
असाता कर्म के उदय में शारीरिक और मानसिक कष्टों का प्रतिकार करने तथा कर्म निर्जरा के प्रश्न पर महाराज श्री ने कहा कि कष्टों का प्रतिकार करना गलत नहीं है। प्रतिकार करते हुए भी यदि मन में समता और निराकुलता बनी रहे तो कर्म निर्जरा संभव है। समता कर्म निर्जरा का सबसे बड़ा अस्त्र है। द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुरूप अपनी चर्या निर्धारित करनी चाहिए। कर्म निर्जरा के नाम पर बुखार आने पर दवाई न लेना उचित नहीं है, क्योंकि शरीर साधना का माध्यम है। संयमित तरीके से कष्टों का प्रतिकार करें, लेकिन मन को आकुलता से बचाएं। उन्होंने कहा कि आकुलता ही बंधन है और निराकुलता ही मुक्ति का मार्ग है।
व्यक्ति के जीवनकाल में उसके गुणों की उपेक्षा और निधन के बाद प्रशंसा करने की सामाजिक प्रवृत्ति पर महाराज श्री ने कहा कि व्यक्ति का महत्व उसके चले जाने के बाद समझ में आता है। बत्तीस दांतों के बीच रहने वाली जीभ को दांतों की उपस्थिति का एहसास नहीं होता, लेकिन उनके बीच से बाहर निकलने पर दिनभर उसी स्थान का एहसास होता रहता है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति की कमी उसके जाने के बाद महसूस होती है। निधन के बाद अच्छी बातें कहना दुखी परिजनों के प्रति सहानुभूति प्रकट करने का माध्यम भी है। इसलिए व्यक्ति के गुणों और योगदान की सराहना उसके जीवनकाल में ही करनी चाहिए। महाराज श्री के मार्गदर्शन का मूल संदेश रहा कि परिवार की नींव संस्कारों पर टिकी होती है। माता-पिता बच्चों को संस्कार दें, संतान माता-पिता का सम्मान और सेवा करे तथा नई और पुरानी पीढ़ी परस्पर अनुभवों का आदर करे। यही संस्कारित परिवार और सुखी समाज का आधार है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
