युवा को केवल करियर नहीं,चारित्र भी चाहिए – अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
करियर से नौकरी और चरित्र से मिलता है सम्मान; युवाओं को अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाकर जीवन को सफल ही नहीं, सार्थक भी बनाना चाहिए
औरंगाबाद/पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ।
युवा देश की सबसे बड़ी शक्ति हैं। युवाओं में असीम ऊर्जा, प्रतिभा और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, लेकिन यदि इस ऊर्जा को सही दिशा और जीवन को स्पष्ट लक्ष्य न मिले, तो यही शक्ति भटकाव का कारण बन सकती है। आज का युवा अनेक अवसरों के बीच खड़ा है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपने जीवन का सही उद्देश्य पहचाने और सफलता के साथ अपने चरित्र का भी निर्माण करे। यह प्रेरक संदेश व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने युवाओं को संबोधित करते हुए दिया।
परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सानिध्य में पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने युवाओं को जीवन की वास्तविक सफलता, अनुशासन, लक्ष्य निर्धारण और चरित्र निर्माण का महत्व समझाते हुए कहा कि युवा होने का अर्थ केवल ऊर्जा से भरपूर होना नहीं, बल्कि उस ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करना भी है।


विकल्प अनेक, लेकिन लक्ष्य स्पष्ट होना जरूरी
आचार्य श्री ने कहा कि आज के युवा के सामने अवसरों और विकल्पों की कोई कमी नहीं है। सोशल मीडिया के माध्यम से उसे पैसा, प्रसिद्धि, विदेशों में बसने और रातों-रात सफल होने के अनेक सपने दिखाई देते हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में वह कई बार अपने वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाता है। परिवार की अपेक्षाएं, समाज की तुलना और मोबाइल की दुनिया के आकर्षण के बीच युवा अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनना भूल जाता है। इसलिए युवाओं को दूसरों की नकल करने के बजाय अपनी प्रतिभा, रुचि और क्षमता को पहचानना चाहिए।




इंस्टेंट सफलता नहीं, मजबूत नींव जरूरी
आचार्य श्री ने आज की इंस्टेंट सफलता की मानसिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि युवाओं को हर चीज तुरंत चाहिए। कुछ सेकंड की रील देखकर उन्हें लगता है कि सफलता भी कुछ दिनों में हासिल हो सकती है, जबकि वास्तविक सफलता के पीछे वर्षों की मेहनत, धैर्य और निरंतर साधना होती है। जिस प्रकार बांस का पौधा पहले अपनी जड़ों को मजबूत करता है और उसके बाद तेजी से ऊंचाई प्राप्त करता है, उसी प्रकार जीवन में भी पहले ज्ञान, संस्कार, मेहनत और आत्मविश्वास की नींव मजबूत करनी पड़ती है। बिना मजबूत आधार के ऊंचाई पर पहुंचना संभव नहीं है।
सुविधा नहीं, अनुशासन चुनें युवा
आचार्य श्री ने युवाओं को अनुशासन का महत्व समझाते हुए कहा कि सुविधा कहती है सुबह देर तक सो जाओ, जबकि अनुशासन कहता है समय पर उठकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो। सुविधा कहती है कि आज भी मोबाइल पर रील देख लो, लेकिन अनुशासन कहता है कि आज कुछ नया सीखो और किताब पढ़ो।
उन्होंने प्रेरक संदेश देते हुए कहा कि सुविधा आज मीठी लगती है, लेकिन कल बीमारी बन सकती है। वहीं अनुशासन आज भले ही कठिन लगे, लेकिन भविष्य में वही सफलता की दवा बनता है। सफल व्यक्ति हमेशा अपनी इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपने लक्ष्य और जिम्मेदारियों के अनुसार निर्णय लेता है।
असफलता अंत नहीं, अनुभव की नई शुरुआत है
आचार्य श्री ने कहा कि असफलता को कमजोरी या जीवन का अंत नहीं समझना चाहिए। असफलता भी एक शिक्षक है, जो हमें हमारी गलतियों और कमियों का एहसास कराती है। असफल होने पर व्यक्ति के सामने दो रास्ते होते हैं—एक बहाने बनाने का और दूसरा अनुभव लेकर आगे बढ़ने का। युवाओं को गिरने से डरना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी गलतियों से सीखकर दोबारा उठने का साहस रखना चाहिए। असफलता से रुक जाना गलत है, लेकिन उससे सीखकर आगे बढ़ना ही वास्तविक सफलता की पहचान है।
लक्ष्य बनाएं, छोटे संकल्पों से शुरुआत करें
आचार्य श्री ने युवाओं को लक्ष्य निर्धारण का व्यावहारिक मार्ग बताते हुए कहा कि लक्ष्य केवल मोबाइल के वॉलपेपर पर लिखने से पूरे नहीं होते, बल्कि उन्हें मन में संकल्प बनाकर प्रतिदिन प्रयास करना पड़ता है। युवा स्वयं से पूछें कि वे कौन-सा कार्य ऐसा कर सकते हैं, जिसे बिना किसी आर्थिक लाभ के भी पूरे मन से करना पसंद करेंगे।
अपनी रुचि, योग्यता और समाज की आवश्यकता को समझकर जीवन की दिशा तय करें। बड़े लक्ष्य को छोटे-छोटे संकल्पों में बांटें। यदि किसी को आईएएस बनना है, तो केवल सपना देखने के बजाय प्रतिदिन ईमानदारी से पढ़ाई करने का संकल्प लेना होगा। याद रखें, बड़े लक्ष्य छोटे-छोटे प्रयासों और निरंतर अनुशासन से ही प्राप्त होते हैं।
करियर के साथ चरित्र निर्माण भी जरूरी
आचार्य श्री ने कहा कि देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है, जो केवल डिग्रियों से बड़े न हों, बल्कि अपनी सोच, दृष्टि, संस्कार और चरित्र से भी महान बनें। करियर व्यक्ति को नौकरी और आर्थिक सफलता दे सकता है, लेकिन चरित्र उसे समाज में सम्मान दिलाता है। धन जीवन में सुविधाएं दे सकता है, लेकिन संस्कार जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।
युवाओं को अपनी प्रतिभा के साथ विनम्रता, सफलता के साथ संस्कार और महत्वाकांक्षा के साथ नैतिकता को भी अपनाना चाहिए। जीवन का उद्देश्य केवल धन कमाना, प्रसिद्धि प्राप्त करना या ऊंचे पद पर पहुंचना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसा व्यक्तित्व बनाना होना चाहिए, जिससे परिवार, समाज और राष्ट्र को गौरव की अनुभूति हो।
सफलता के साथ जीवन को सार्थक बनाएं
अंत में आचार्य श्री ने युवाओं को प्रेरित करते हुए संदेश दिया कि अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें, समय का सदुपयोग करें, अनुशासन को जीवन का हिस्सा बनाएं और अपने करियर के साथ चरित्र का भी निर्माण करें। क्योंकि वास्तविक सफलता वही है, जिसमें व्यक्ति स्वयं आगे बढ़ने के साथ दूसरों के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन लाए।
करियर आपको सफल बना सकता है, लेकिन चरित्र आपको महान बनाता है। इसलिए जीवन में केवल सफल बनने का सपना मत देखिए, बल्कि एक अच्छा इंसान बनने का संकल्प भी लीजिए।
इस प्रेरणादायी प्रवचन की जानकारी सकल जैन समाज, छत्रपति संभाजीनगर के प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद ने दी।
