“अप्रभावना न करना ही सबसे बड़ी प्रभावना है।”
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि आचार्य परम्परा की आत्मा को समझाने वाला वह अमूल्य संदेश है, जिसके उद्गाता थे विश्ववंदनीय, जन-जन के हृदय में विराजमान आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज। एक दौर ऐसा था कि छोटे-बड़े, युवा-तरुण और वृद्ध सभी बड़े गौरव से कहते थे— आचार्य श्री अर्थात् गुरुश्रेष्ठ विद्यासागर जी महाराज।
विद्वानों का मत है कि गुरु की उपस्थिति से अधिक महत्वपूर्ण उनके वचनों की उपस्थिति है। जो शिष्य गुरु की प्रत्येक बात को जीवन में उतारता है, उसे गुरु का आशीर्वाद दूर रहकर भी प्रत्यक्ष अनुभव होता है।


मेरा मन कहता है कि आचार्य श्री के लाड़ले, उनके वचनों का शब्दशः अनुसरण करने वाले प्रभावक संत, जिन्हें आज का युवा मुनिपुंगव, जगत पूज्य, श्रावक संस्कार प्रणेता और तीर्थ जीर्णोद्धारक जैसे विशेषणों से पहचानता है, वे पूज्य मुनि श्री सुधासागर जी महाराज इंदौर की धरा पर नित नए इतिहास रच रहे हैं।


आगामी 15, 16 एवं 17 दिसम्बर को सुमतिधाम में होने जा रहे विशेष आयोजन की धूम है। संयोग देखिए, आचार्य श्री के विचारों को हृदय में बसाने वाले भक्तों का समूह आज उसी आयोजन की सफलता के लिए दिन-रात एक कर रहा है। उद्देश्य केवल आयोजन करना नहीं, बल्कि गुरु के विचारों की प्रभावना का ऐसा इतिहास रचना है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने।
सौभाग्यशाली हैं वे भक्त, जिन्हें कभी आचार्य श्री के दर्शन-स्पर्श का अवसर मिला और उससे भी अधिक सौभाग्यशाली वे, जो आज उनकी एक-एक सीख को अपने आचरण में जीवित रखे हुए हैं। आचार्य श्री की देह भले ही हमारे बीच नहीं, लेकिन उनके विचार आज भी जगत पूज्य के माध्यम से जन-जन तक पहुँच रहे हैं। यही तो है गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और अप्रभावना न करने की जीवंत मिसाल!

जगत पूज्य के करकमलों से दिगम्बर प्रतिमाओं का निर्माण और संस्कारों का मंगलमय संचार होगा। ऐसे अवसर पर श्रद्धालुओं की भीड़ का अनुमान लगाना कठिन नहीं, असंभव है! और इस विराट स्वप्न को साकार करने में मनीष गोधा जी की आयोजन क्षमता, समर्पण और दूरदर्शिता भी प्रशंसा की अधिकारी है। वे पुनः सिद्ध करेंगे कि संकल्प जब श्रद्धा से जुड़ता है तो इतिहास स्वयं आकार लेने लगता है।
आचार्य श्री ने जो कहा, जगत पूज्य उसे जी रहे हैं; और भक्त उस जीवन-संदेश को जन-जन तक पहुँचा रहे हैं।
यही गुरु की सच्ची प्रभावना है, यही परम्परा की वास्तविक गरिमा है और यही आचार्य श्री के प्रति सच्चा समर्पण है।
जय हो जगत पूज्य!
आपके व्यक्तित्व में गुरु-वचनों की ऐसी आभा है, जिसमें आचार्य श्री के संस्कार आज भी स्वर्णिम होकर चमकते हैं।
#श्रीश ललितपुर
