मन के विकारों को ठीक करना होगा-स्वस्तिभूषण माताजी
मुरार-ग्वालियर
दुख दूर करने की तैयारी सुख में की जाती है । जब प्यास लगती है तब कुआं नहीं खोदा जाता, अंधेरा होने से पहले दीपक की व्यवस्था की जाती है। ।जीवन में दुख आने पर यदि कोई तैयारी नहीं की तो दुख की भगाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है । यदि दीपक तैयार रखा हो तो हमें अंधेरे से डर नहीं लगता । यात्रा में जाना हो, सीट कन्फर्म हो तो कोई परेशानी नहीं होती । पहले से पढ़ाई की हो तो परीक्षा सरल व सहज लगती है । कहने का तात्पर्य यह है कि जो सांसारिक प्राणी जीवन में तैयारी करके आगे बढ़ता है, वह दुखी नहीं होता । उक्त विचार गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने जैन धर्मशाला मुरार में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुये व्यक्त किये ।

मनोज नायक ने बताया की पूज्य आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने जीवन का सार समझाते हुए कहा कि व्यक्ति की तैयारी दो तरह से होती है । एक समान आदि के द्वारा, दूसरी भावों के द्वारा । जैसे सर्दी आने से पहले गर्म कपड़ों की व्यवस्था, अचानक बीमारी की स्थिति में घर में दवाईयों की व्यवस्था, बुढ़ापे की व्यवस्था हेतु सन्तानोत्पत्ति करना आदि ।
भावों की तैयारी में विकारों को ठीक करके होती है । मन में सदैव कोई न कोई विचार चलता रहता है । मन का काम ही कोई न कोई विचार उत्पन्न करना है । वह इसके बिना रह ही नहीं सकता । मन मिला है वो शब्द रूप विचार होते हैं । मन न हो तो भाव तो होते ही हैं । मन मिलने पर भावों में विचार करने की विशेष विशेषता आ जाती है । विचार दो तरह के होते हैं । अपने आप स्वतः विचार चलते रहना, दूसरा हम जो चाहें वो विचार करना । बुरे विचार, कषायों के विचार, पाप के विचार, राग द्वेष मोह के विचार, निंदा बुराई ईर्ष्या के विचारों का संस्कार अनन्तकाल से है । इसीलिए बिना प्रयास के के विचार स्वतः ही आ जाते हैं ।

किंतु परमात्मा की भक्ति के विचार, सत्संग के विचार, तत्व चिन्तन के विचार, आत्मा के विचार बड़ी मुश्किल से आते हैं । ऐसा अभ्यास की कमी के कारण होता है । बुढ़ापा सुधारने के लिए मानसिक अभ्यास की आवश्यकता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
