अगर हम स्वयं ही अपना मूल्य नहीं समझेंगे तो कोई भी हमारा सम्मान नहीं करेगा स्वस्तिभूषण माताजी

धर्म

अगर हम स्वयं ही अपना मूल्य नहीं समझेंगे तो कोई भी हमारा सम्मान नहीं करेगा स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन
शिक्षा हमारे जीवन में हमारी सोच हमारे विचार पहनावा भोजन रहन सहन श्रद्धान बदल देती है! आज कोन्वेंट स्कूल में शिक्षा के नाम हमारे बच्चों को पाश्चात्य संस्कार दिये जा रहे हैं! बचपन से बच्चों को जो संस्कार दिये जाते हैं वह जिंदगी भर रहते हैं!

 

 

हमें विचार करना चाहिए कि हमारी नई पीढ़ी किस दिशा में जा रही है! अपने मंगल उद्बोधन में स्वस्तिभूषण
माता जी ने कहा कि आज इस शास्त्री परिषद के शिविर में सैकड़ों विद्वान् बैठे हैं सभी विद्वान् अगर अपने अपने शहर में जहाँ वह रहते हैं वहां नियमित रूप से शास्त्रों का स्वाध्याय करवाएं! बच्चों को पाठशाला के माध्यम से धार्मिक शिक्षा एवं धार्मिक संस्कार देने का कार्य करें तो हमारी आगे की पीढियां धार्मिक एवं संस्कारवान बनी रहेंगी

 

 

 

 

 

माताजी ने कहा की!जब लौकिक शिक्षा में इतनी शक्ति है कि वह हमारे विचार हमारी सोच रहन सहन को बदल सकती है तो क्या हमारे धर्म में इतनी शक्ति नहीं है कि वह पाश्चात्य संस्कृति को बदल सके!
तीन अंधरे कमरों के दरवाजे खुले हों एक सीध में एक दीपक जलाकर रख दिया जाये तो तीनों कमरों को प्रकाशित कर देता है! वैसे ही एक विद्वान् पूरे गांव को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित कर देता है! विद्वतजनों आप सभी ने जितना ज्ञान परिश्रम से प्राप्त किया है उसको बांटोगे तो आपका ज्ञान और बढ़ जायेगा लेकिन बांटा नहीं तो घट जायेगा!
माता जी ने विद्वानों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आपके वस्त्रो से पता चलना चाहिए की आप विद्वान् है! आपको अपनी कीमत पहले स्वयं करनी होगी! अगर हम स्वयं ही अपना मूल्य नहीं समझेंगे तो कोई भी हमारा सम्मान नहीं करेगा! विद्वान् हमेशा दीपक की भांति होता है जहां रहता है वहाँ प्रकाश करता है! और दीपक को हमेशा उच्च स्थान पर रखा जाता है!

चेतन जैन केशव राय पाटन से प्राप्त जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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