सल्लेखना” आकस्मिक क्रिया नहीं, जीवनभर के संयम, वैराग्य और आध्यात्मिक संस्कारों से जुड़ी साधना : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर*

धर्म

“*सल्लेखना” आकस्मिक क्रिया नहीं, जीवनभर के संयम, वैराग्य और आध्यात्मिक संस्कारों से जुड़ी साधना : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर*
श्रीसम्मेद शिखरजी।

सल्लेखना जीवन के अंतिम समय में की जाने वाली कोई आकस्मिक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवनभर के संयम, वैराग्य, त्याग और आध्यात्मिक संस्कारों से विकसित होने वाली साधना है। इसकी तैयारी अंतिम समय में नहीं, बल्कि स्वस्थ और जागरूक अवस्था में रहते हुए प्रारंभ कर देनी चाहिए यह प्रेरक मार्गदर्शन राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने गुणायतन में आयोजित शंका समाधान में जीवन की सार्थकता, माता-पिता के प्रति संतान के कर्तव्य, समाधिमरण और सल्लेखना की तैयारी संबंधी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए दिया। उन्होंने कहा
गृहस्थ जीवन के दायित्वों का निर्वहन करते हुए व्रत, नियम, त्याग और आत्मसंयम का अभ्यास करना चाहिए तथा समय आने पर गुरु की शरण में रहकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

 

 

 

गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि भामाशाह अशोक पाटनी एवं श्रीमती सुशीला पाटनी ने गुणायतन पहुंचकर अपने पिता के समाधिमरण के समय मुनि श्री से प्राप्त मार्गदर्शन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की तथा भविष्य में स्वयं सल्लेखना और समाधि की तैयारी को लेकर जिज्ञासाएं रखीं।उन्होंने बताया कि हमारे पिता कंवरीलाल पाटनी के अंतिम समय में परिवार को मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज के साथ साथ इंदौर में विराजमान निर्यापक श्रमण मुनि श्री सुधासागर महाराज तथा किशनगढ़ में विराजमान आचार्य विहर्षसागर जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त हुआ निवेदन पर आचार्य श्री घर पधारे तथा पिता को अंतिम समय में धर्मोपदेश देकर दस प्रतिमा के नियम दिलाए। परिवार ने सामायिक, आलोचना पाठ और अन्य धार्मिक क्रियाओं के माध्यम से पिता को अंतिम समय तक धर्माराधना में सहयोग दिया। पिता ने अपनी अंतिम इच्छा में स्पष्ट लिखा था कि देहांत के बाद कोई दिखावा अथवा अनावश्यक आयोजन नहीं किया जाए। परिवार ने उनकी भावना का सम्मान करते हुए सादगी से अंतिम विदाई दी। मुनि श्रीप्रमाणसागर महाराज ने पाटनी परिवार की सजगता और उनकी धार्मिक भावना की सराहना करते हुए कहा कि पिता कंवरी लाल जी के पुण्य, धर्म के प्रति जागरूकता और परिवार के सहयोग ने उनके अंतिम समय को सार्थक बनाया। उन्होंने कहा कि मृत्यु के समय शास्त्रों में वर्णित कुछ लक्षणों को लेकर अंधविश्वास नहीं करना चाहिए। जीवन अनिश्चित है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सदैव धर्म, संयम और आत्मकल्याण के प्रति जागरूक रहना चाहिए। सल्लेखना की तैयारी के संबंध में मुनि श्री ने कहा कि अंतिम समय में शारीरिक पीड़ा, मोह और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं व्यक्ति की साधना में बाधक बन सकती हैं। उस समय स्वयं पर नियंत्रण भी कम हो सकता है। इसलिए सल्लेखना कोई अंतिम समय का निर्णय मात्र नहीं, बल्कि जीवनभर की आध्यात्मिक तैयारी है। प्रत्येक श्रावक को अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत, नियम और त्याग का अभ्यास करना चाहिए। गृहस्थ जीवन के दायित्व पूरे करने के बाद गुरु की शरण में रहकर संयम और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ना श्रेष्ठ है। माता-पिता के प्रति संतान के कर्तव्यों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी सेवा से प्रसन्न रखना, अपनी उपलब्धियों का श्रेय उन्हें देना, उनकी आत्मोन्नति में सहयोग करना और अपने सद्कर्मों से उनका यश बढ़ाना संतान का दायित्व है। उनके संस्कारों को आगे बढ़ाना ही उनके उपकारों का वास्तविक सम्मान है। मुनि श्री ने अशोक पाटनी परिवार द्वारा माता-पिता की संपत्ति को परमार्थ एवं जनकल्याण में लगाने के संकल्प को अनुकरणीय बताया। उन्होंने कहा कि परिवार पहले से ही रतनलाल कंवरलाल (आरके मार्बल ट्रस्ट) के माध्यम से समाजसेवा और जनकल्याण में योगदान देता आ रहा है। दिवंगत माता-पिता के नाम पर अनावश्यक भोज और दिखावे के आयोजन करने के बजाय जरूरतमंदों की सहायता, समाजसेवा और धर्म के उत्थान में धन लगाना अधिक सार्थक है। यही माता-पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है। जीवन की सार्थकता पर उन्होंने कहा कि धन, नाम, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि से अधिक महत्वपूर्ण शांति, संतोष, पवित्रता और आनंद अर्जित करना है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसने आत्मकल्याण के लिए क्या किया। साधु हो या गृहस्थ, सभी का अंतिम ध्येय आत्मिक उन्नति होना चाहिए। डिजिटल युग में जिनवाणी के अध्ययन पर मुनि श्री ने कहा कि मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से मंत्र जाप तथा शास्त्रों का अध्ययन उपयोगी है। श्रवण परंपरा से ताड़पत्र, हस्तलिखित प्रतियों, मुद्रित पुस्तकों और अब डिजिटल माध्यमों तक जिनवाणी के संरक्षण एवं अध्ययन की यात्रा पहुंची है। तकनीक अपनाने में संकोच नहीं करना चाहिए, लेकिन जिनवाणी के प्रति विनय, श्रद्धा और बहुमान बनाए रखना अनिवार्य है।

 

 

धार्मिक अध्ययन के लिए अलग उपकरण रखना बेहतर है, ताकि उसका उपयोग अन्य कार्यों में न हो। उन्होंने कहा कि केवल जानकारी प्राप्त करना और वास्तविक ज्ञान अर्जित करना अलग-अलग बातें हैं। विनय के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। नई पीढ़ी आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए स्वाध्याय करे, लेकिन जिनवाणी की मर्यादा, पवित्रता और सम्मान का सदैव ध्यान रखे। प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि प्रातःकालीन बेला में मुनि संघ के सानिध्य में पाटनी परिवार के द्वारा संगीतमय गणधर वलय विधान संपन्न हुआ जिसमें गुणायतन परिवार ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *