“ठंडे समोसे गर्म करो, औरत समाज शर्म करो!” के नारों पर अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उठाए सवाल
बोले— आवाज बुलंद हो, लेकिन शब्दों की मर्यादा भी बनी रहे; अन्याय के खिलाफ संघर्ष हो, पूरे समाज का अपमान नहीं
छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद)।
समाज में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और समानता का मुद्दा जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही आवश्यक है कि अपनी बात रखने की भाषा भी गरिमापूर्ण हो। आक्रोश के बीच शब्दों की मर्यादा और सामाजिक संवेदनशीलता बनाए रखना जरूरी है। इसी विषय पर पुष्पगिरि तीर्थ सोनकच्छ में वर्षायोगरत व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “आवाज उठाना हर व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन जब आवाज में किसी दूसरे का अपमान घुल जाए, तो वह अधिकार नहीं, बल्कि चूक बन जाती है।”
गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने महिलाओं के अधिकारों, सामाजिक आक्रोश, पुरुषों के प्रति सामान्यीकृत टिप्पणियों और आपसी सम्मान की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।



महिलाओं की पीड़ा समझना जरूरी, लेकिन पूरे समाज को दोषी ठहराना उचित नहीं
आचार्य श्री ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगाए गए कुछ नारों का उल्लेख करते हुए कहा कि “चाय गरम, दूध गरम, मर्द समाज बेशर्म!” और “एक कचौड़ी, दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा!” जैसे नारों के पीछे महिलाओं की पीड़ा और आक्रोश हो सकता है। उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनना और समझना समाज का दायित्व है। महिलाओं को सुरक्षा, सम्मान और समानता का पूरा अधिकार है तथा जहां अन्याय हो, वहां आवाज उठाना आवश्यक है।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या कुछ व्यक्तियों की गलतियों के कारण पूरे समाज को एक ही तराजू में तौलना उचित है? किसी एक व्यक्ति के अपराध या गलत व्यवहार के लिए समूचे पुरुष समाज को दोषी ठहराना भी अन्यायपूर्ण हो सकता है।



एक पिता, भाई और पति के योगदान को भी समझें
आचार्य श्री ने कहा कि उस पिता के बारे में भी विचार करना चाहिए, जो अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए चिंतित रहता है। उस भाई को भी समझना चाहिए, जो अपनी बहन की पढ़ाई और सपनों को पूरा करने में सहयोग करता है। उस पति के योगदान को भी देखना चाहिए, जो अपनी पत्नी की सफलता को अपनी सफलता से बढ़कर खुशी के साथ स्वीकार करता है।
समाज में गलत करने वाले लोगों के खिलाफ आवाज उठनी ही चाहिए, लेकिन उनके कारण उन सभी लोगों को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं, जो महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों के पक्ष में खड़े हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि “नारे छोटे होते हैं, लेकिन रिश्ते बहुत बड़े होते हैं।” समाज केवल पुरुषों या महिलाओं से नहीं, बल्कि दोनों के सहयोग, विश्वास और सम्मान से बनता है। परिवार में मां और पिता, बहन और भाई, पति और पत्नी—सभी की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि एक-दूसरे के प्रति अपमान की भावना बढ़ेगी, तो सामाजिक सुधार की राह भी कठिन हो जाएगी।
सुधार गाली से नहीं, समझदारी से आता है
आचार्य श्री ने अपने संदेश में कहा कि क्रोध कभी-कभी जायज हो सकता है, लेकिन उसे व्यक्त करने का तरीका भी गरिमापूर्ण होना चाहिए। मीठी भाषा में कही गई कड़वी सच्चाई कई बार कठोर शब्दों में कही गई बात से अधिक प्रभावशाली होती है।
उन्होंने कहा कि संघर्ष किसी गलत सोच, अन्यायपूर्ण व्यवस्था और अपराधी मानसिकता के खिलाफ होना चाहिए, संपूर्ण मानव जाति के खिलाफ नहीं। जब हम कहते हैं कि मानवता शर्मसार हुई है, तो इसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल होते हैं। केवल अपमानजनक शब्दों के माध्यम से इंसानियत को सुधारना संभव नहीं है।
समाधान का रास्ता—संवाद, सम्मान और संवेदना
आचार्य श्री ने सामाजिक सुधार के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें सामने रखीं।
1. गलत व्यक्ति और घटना की पहचान करें: जहां अपराध या अन्याय हुआ है, वहां संबंधित व्यक्ति, घटना और परिस्थितियों के आधार पर आवाज उठाएं। किसी एक की गलती के लिए पूरे समाज को दोषी न ठहराएं।
2. सहयोगियों को साथ लेकर चलें: महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के पक्ष में खड़े पिता, भाई, मित्र, शिक्षक और अन्य पुरुषों को विरोधी नहीं, बल्कि बदलाव की प्रक्रिया का सहयोगी बनाएं।
3. भाषा की मर्यादा बनाए रखें: शब्द हमारी आवाज की शक्ति हैं। “हमें सुरक्षा चाहिए, हमें सम्मान चाहिए” जैसे सकारात्मक और प्रभावशाली संदेश लोगों के दिलों तक पहुंच सकते हैं। भाषा जितनी संयमित और स्पष्ट होगी, संवाद की संभावना उतनी ही मजबूत होगी।
न्याय के लिए आवाज उठे, लेकिन इंसानियत का सम्मान भी बना रहे
अपने संदेश के माध्यम से आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और समानता के लिए आवाज उठाना आवश्यक है, लेकिन सामाजिक परिवर्तन के लिए परस्पर सम्मान और संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है।
उन्होंने कहा कि आवाज इतनी बुलंद होनी चाहिए कि अन्याय कांप उठे, लेकिन शब्द इतने मर्यादित हों कि इंसानियत का सिर न झुके। समाज नफरत और अपमान से नहीं, बल्कि न्याय, संवेदना, संस्कार, संवाद और आपसी सम्मान से बदलता है।
संदेश यही है कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष अवश्य करें, लेकिन ऐसा करते समय मानवीय गरिमा और सामाजिक सद्भाव को भी बनाए रखें।
इस संबंध में जानकारी सकल जैन समाज, छत्रपति संभाजीनगर के प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल ने दी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
