अजमेर में आज भी जीवंत हैं आचार्य विद्यासागरजी की दीक्षा की स्मृतियां, 30 जून 1968 को ली थी मुनि दीक्षा
दीक्षा से पहले पांच दिन तक निकली थीं बिंदोलियां, नया बाजार में हुआ था आहार; स्व. हुक्मीचंद और जतन कंवर को मिला था दीक्षार्थी माता-पिता बनने का सौभाग्य
**अजमेर।** संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज का जीवन त्याग, तपस्या, साधना और आत्मकल्याण की प्रेरणा देने वाला रहा है। दिगंबर जैन समाज के परम आराध्य आचार्यश्री की दीक्षा से जुड़ी अजमेर की स्मृतियां आज भी श्रद्धालुओं के हृदय में विशेष स्थान रखती हैं। **30 जून 1968 को अजमेर की पावन धरा पर आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण कर उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया था।** यही कारण है कि अजमेर का उनका दीक्षा स्थल जैन समाज के लिए श्रद्धा और आस्था का विशिष्ट केंद्र माना जाता है।
## पांच दिनों तक गूंजा था उत्सव का उल्लास
आचार्यश्री की मुनि दीक्षा से पहले अजमेर में पांच दिनों तक बिंदोलियां निकाली गई थीं। पूरे शहर में उत्सव जैसा वातावरण था। आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज के अजमेर पदार्पण के साथ ही दीक्षा समारोह को लेकर श्रद्धालुओं में अपार उत्साह दिखाई दिया। इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बनने के लिए केवल अजमेर और राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न शहरों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे।



उस समय महावीर सर्किल के आसपास आज जैसी आवाजाही नहीं थी। क्षेत्र का बड़ा हिस्सा खाली मैदान के रूप में था। दीक्षा समारोह में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी थी और दीक्षा स्थल पूरी तरह भरा हुआ था।
## नया बाजार में हुआ था गुरुवर का आहार
आचार्यश्री की दीक्षा से एक दिन पहले की स्मृति भी अत्यंत भावपूर्ण है। वे अजमेर के नया बाजार क्षेत्र में नृसिंहजी के नोहरे के पास स्थित एक पुराने मकान में आहार ग्रहण करने पधारे थे। उस समय स्वर्गीय हुक्मीचंदजी और उनकी धर्मपत्नी जतन कंवरजी को गुरुवर को आहार कराने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।




गुरुवर के आगमन का समाचार मिलते ही घर पर बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हो गए थे। परिवार के लिए यह क्षण अविस्मरणीय बन गया। सबसे विशेष बात यह रही कि **स्व. हुक्मीचंदजी और जतन कंवरजी को आचार्यश्री की दीक्षा के अवसर पर दीक्षार्थी के माता-पिता बनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ था।** यह प्रसंग आज भी परिवार और समाज के लिए गौरवपूर्ण स्मृति के रूप में याद किया जाता है।
## वस्त्र त्याग के समय हुई थी हल्की बारिश
दीक्षा समारोह से जुड़ा एक प्रसंग आज भी श्रद्धालुओं के बीच भावपूर्ण ढंग से स्मरण किया जाता है। बताया जाता है कि दीक्षा कार्यक्रम के दौरान आसमान में बादल छाए हुए थे। जैसे ही गुरुवर ने मुनि दीक्षा की प्रक्रिया में वस्त्रों का त्याग किया, उसी समय हल्की बारिश होने लगी। उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए यह दृश्य अत्यंत भावुक और अविस्मरणीय था।
अजमेर की धरती पर संपन्न हुआ यह दीक्षा समारोह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि त्याग, वैराग्य और आत्मसाधना के उस महान अध्याय का आरंभ था, जिसने आगे चलकर आचार्य विद्यासागरजी महाराज को देश-विदेश में असंख्य श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केंद्र बनाया।
## 1972 में नसीराबाद में मिला आचार्य पद
आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज का जन्म कर्नाटक के बेलगाम क्षेत्र के निकट चिक्कोड़ी ग्राम में शरद पूर्णिमा के दिन एक दिगंबर जैन परिवार में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1967 में आचार्य देशभूषणजी महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया। इसके बाद आषाढ़ शुक्ल पंचमी, 30 जून 1968 को अजमेर में आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज से दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार मुनि दीक्षा ली।
बाद में 22 नवंबर 1972 को नसीराबाद में आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज ने उन्हें आचार्य पद प्रदान किया। उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व के साथ-साथ साहित्य साधना भी विलक्षण रही। उन्होंने कन्नड़, हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, प्राकृत और बांग्ला सहित विभिन्न भाषाओं में लेखन किया। उनके चर्चित महाकाव्य **‘मूकमाटी’** ने साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान बनाई। उनके विचारों, साहित्य और जीवन साधना ने समाज को संयम, करुणा, अहिंसा और आत्मकल्याण का संदेश दिया।
आज आचार्य विद्यासागरजी महाराज के जन्मोत्सव के अवसर पर अजमेर में उनकी दीक्षा से जुड़ी ये स्मृतियां एक बार फिर श्रद्धालुओं को उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाती हैं, जब इसी पावन धरा पर एक युवा साधक ने वैराग्य का मार्ग अपनाकर अपना संपूर्ण जीवन धर्म, साधना और मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दिया था।
**संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी**
