ज्ञान और त्याग की सच्ची पहचान पद से नहीं, कृतित्व से होती है;♦
ज्ञान और त्याग की सच्ची पहचान पद से नहीं, कृतित्व से होती है; किंतु जब कृतित्व स्वयं किसी पद की गरिमा को सिद्ध कर दे, तब उस पद पर प्रतिष्ठित करना योग्यता का पारितोषिक बन जाता है।
पूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज ने विरोध की परवाह किए बिना युवा विद्याधर को मुनि दीक्षा देकर भविष्य के आचार्य विद्यासागर जी महाराज को संसार के सामने प्रकट किया था। आज इतिहास स्वयं को दोहराने के द्वार पर खड़ा है। विद्वानों और मनीषियों द्वारा बार-बार पद ग्रहण की याचना किए जाने पर भी उसे अनसुना करना उनकी निस्पृहता का प्रमाण अवश्य है, किंतु निस्पृहता का सम्मान करना और समय की आवश्यकता को स्वीकार करना—दोनों ही श्रेष्ठता के लक्षण हैं।

जब किसी मुनिराज ने अपने ज्ञान, तप, त्याग, संघ-संचालन और जिनशासन की प्रभावना से आचार्यत्व की पात्रता पहले ही सिद्ध कर दी हो, तब पद देना कृपा नहीं, उनकी योग्यता का सम्मान है। आज आवश्यकता किसी की महत्त्वाकांक्षा पूरी करने की नहीं, बल्कि समाज की श्रद्धा, विद्वानों की भावना और समय की पुकार का सम्मान करने की है।
पद की याचना करना अलग बात है, पद के योग्य सिद्ध होना अलग; और योग्य होने के बाद भी पद के प्रति निस्पृह रहना उससे भी बड़ी बात है। जब योग्यता सामने हो, समाज एकमत होकर प्रतिष्ठा की अपेक्षा कर रहा हो और जिनशासन की प्रभावना की संभावनाएँ स्पष्ट हों, तब पद न देना विनम्रता नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ अवसर को टालना होगा।
अब समय आ गया है कि योग्यता को पद और त्याग को प्रतिष्ठा मिले। क्योंकि आचार्य पद किसी की महत्त्वाकांक्षा का मुकुट नहीं, उसकी साधना, सामर्थ्य और समर्पण का पारितोषिक है।
#श्रीश ललितपुर
