आत्मा में अनंत संभावनाएं, जरूरत है स्वयं को पहचानने और पुरुषार्थ जगाने की : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी
“बिजली तो पूरी आ रही है, हमने ही बल्ब छोटा लगा रखा है; समुद्र पूरा पानी से भरा है, हम चुल्लू भर पानी से खुश हो रहे हैं” — गुरु भक्तों को दिया आत्मशक्ति और विवेक जागरण का संदेश
सोनकच्छ/पुष्पगिरि तीर्थ।
मनुष्य की आत्मा अनंत संभावनाओं और असीम शक्तियों से परिपूर्ण है, लेकिन आज का व्यक्ति अपनी वास्तविक क्षमता को पहचानने में असमर्थ है। हमारी चेतना की शक्ति आज भी अनंत है, जरूरत केवल उसे जागृत करने, संकल्पों को मजबूत बनाने और पुरुषार्थ को सही दिशा देने की है। यह प्रेरक संदेश व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरि तीर्थ में गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए दिया।
परम पूज्य पुष्पगिरि तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ पुष्पगिरि तीर्थ, सोनकच्छ में वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी श्रृंखला में आचार्यश्री ने आत्मचिंतन, विवेक और पुरुषार्थ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए जीवन को नई दिशा देने का आह्वान किया।
आत्मा में कमी नहीं, प्रयासों में कमी है
आचार्यश्री ने प्रेरक उदाहरण देते हुए कहा, “बिजली तो पूरी आ रही है, हमने ही बल्ब छोटा लगा रखा है। समुद्र तो पूरा पानी से भरा है, हम ही चुल्लू भर पानी से खुश हो रहे हैं।”
उन्होंने समझाया कि कमी आत्मा की शक्ति में नहीं, बल्कि हमारे प्रयासों, संकल्पों और पुरुषार्थ में है। मनुष्य अपनी क्षमताओं का सीमित उपयोग करके संतुष्ट हो जाता है, जबकि उसके भीतर असीम संभावनाएं छिपी हुई हैं। जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं पहचानेगा और अपनी चेतना की शक्ति को जागृत नहीं करेगा, तब तक वह अपनी वास्तविक क्षमता का अनुभव नहीं कर पाएगा।


दूसरों को समझने में माहिर, स्वयं को समझना बाकी
आचार्यश्री ने वर्तमान जीवनशैली पर चिंतन करते हुए कहा कि आज के व्यक्ति के पास ज्ञान की कोई कमी नहीं है, लेकिन स्वयं को समझने के लिए समय नहीं है। दूसरों को समझाने में हमने पीएचडी कर ली है, मगर अपने भीतर झांकना अभी बाकी है।



मनुष्य के मन में अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के विचार उठते हैं। महत्वपूर्ण यह नहीं कि मन में कौन-सा विचार आया, बल्कि यह है कि हम किस विचार को स्वीकार करते हैं, किस पर ठहरते हैं और किसे अपने आचरण का हिस्सा बनाते हैं। अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार को समझना ही आत्मचिंतन की शुरुआत है।
ज्ञान से अधिक आवश्यक है विवेक
आचार्यश्री ने कहा कि आज ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि विवेक की कमी है। ज्ञान हमें जानकारी देता है, जबकि विवेक हमें उस जानकारी का सही उपयोग करना सिखाता है। विवेकपूर्ण ज्ञान जीवन को सही दिशा और उचित बोध प्रदान करता है।
अच्छे मार्ग पर चलने के लिए केवल ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान के अनुरूप सही निर्णय लेने की क्षमता भी आवश्यक है। सच्चा ज्ञान वही है, जो केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण में दिखाई दे। जब ज्ञान हमारे निर्णयों को विवेकपूर्ण बनाए, व्यवहार में विनम्रता लाए और कर्मों को संयमित करे, तभी समझना चाहिए कि ज्ञान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है।
अपनी अनंत शक्ति को पहचानें
आचार्यश्री ने गुरु भक्तों को प्रेरित करते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी सीमित सोच से बाहर निकलकर अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानना चाहिए। निराशा, कमजोरी और आत्मविश्वास की कमी के कारण व्यक्ति अपनी संभावनाओं को सीमित कर लेता है, जबकि उसकी चेतना में असीम शक्ति विद्यमान है।
उन्होंने संदेश दिया कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मविश्वास, विवेक, दृढ़ संकल्प और निरंतर पुरुषार्थ आवश्यक हैं। व्यक्ति जब अपने भीतर झांकता है, अपनी कमियों को पहचानता है और उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, तभी वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होती है।
आचार्यश्री का संदेश है कि “संभावनाएं अनंत हैं, शक्ति अपार है; बस जरूरत है स्वयं को पहचानने की और पुरुषार्थ को जगाने की।” उनका यह प्रेरक संदेश आत्मचिंतन, आत्मविश्वास और विवेकपूर्ण जीवन जीने की दिशा में प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरित करता है।
प्रचार-प्रसार संयोजक: नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद)। से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
