शोर में जानकारी मिलती है, मौन में सत्य का बोध होता है : व्रत चक्रवर्ती पटटविभुषन अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

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शोर में जानकारी मिलती है, मौन में सत्य का बोध होता है : व्रत चक्रवर्ती पटटविभुषन अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

‘बुद्धि सही-गलत का ज्ञान देती है, जबकि विवेक उस ज्ञान का सही उपयोग करना सिखाता है’ — पुष्पगिरी तीर्थ में मौन साधना के महत्व पर दिया संदेश

औरंगाबाद/सोनकच्छ।

गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने मौन, आत्मचिंतन और विवेक के महत्व पर प्रकाश डाला।

आचार्य श्री ने कहा कि आज चारों ओर खबरों, सोशल मीडिया और लोगों की राय का शोर है। यह शोर हमें हर पल नई-नई जानकारियां तो देता है, लेकिन ये जानकारियां हमारे दिमाग को भर देती हैं, मन को नहीं। आज इंसान बहुत कुछ जानता है, लेकिन उस पर अमल नहीं कर पाता। वह न तो हर बात को गहराई से समझ पाता है और न ही उसे आत्मसात कर पाता है। इसका कारण यह है कि सत्य का अनुभव शोर में नहीं, बल्कि मौन में होता है।

 

 

 

उन्होंने कहा कि शोर बाहर की दुनिया है, जबकि मौन हमारे भीतर का सबसे बड़ा तप है। शोर में हम दुनिया की आवाजें सुनते हैं, लेकिन मौन में हमें अपनी आत्मा की आवाज सुनाई देती है। इसी आत्मबोध की दिशा में उनकी ‘मौन से कौन’ की आध्यात्मिक यात्रा चल रही है। मौन केवल बोलना बंद कर देना नहीं, बल्कि अपने भीतर उतरकर स्वयं को जानने और समझने का माध्यम है।

 

सुनने और समझने का धैर्य खो रहा है इंसान

आचार्य श्री ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज विडंबना यह है कि न कोई किसी को सुनना चाहता है, न समझना चाहता है और न ही किसी की बात स्वीकार करने को तैयार है। हर व्यक्ति अपनी बात कहने में लगा है, लेकिन दूसरों की बात सुनने का धैर्य लगातार खोता जा रहा है। ऐसे वातावरण में मौन हमें धैर्य, सहनशीलता और आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि जानकारी व्यक्ति को बुद्धिमान बना सकती है, लेकिन मौन उसे विवेकवान बनाता है। बुद्धि सही और गलत का ज्ञान देती है, जबकि विवेक उस ज्ञान का सही उपयोग करना सिखाता है। जीवन में केवल बुद्धिमान और होशियार होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विवेकवान होना अधिक आवश्यक है। बुद्धि दूसरों को परखना सिखाती है, जबकि विवेक स्वयं को पहचानना सिखाता है।

मौन से मिलता है आत्मपहचान का मार्ग

आचार्य श्री ने जीवन में आत्मचिंतन अपनाने का संदेश देते हुए कहा कि व्यक्ति को थोड़ा बोलना, अधिक सुनना, कम जानकारियों में उलझने के बजाय गहराई से समझना और कुछ पल मौन रहकर स्वयं को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। जब मन का शोर शांत होता है, तभी व्यक्ति अपने भीतर की सच्चाई को समझ पाता है और जीवन में सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है।

आचार्य श्री का यह संदेश आधुनिक जीवन की भागदौड़ और सूचनाओं के शोर के बीच आत्मशांति, विवेक और आत्मबोध का मार्ग दिखाता है। मौन को कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मशक्ति मानकर अपनाना ही जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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