ज्ञान की ऐसी ललक कि नींद पर भी पा लिया विजय, चोटी को खूंटे से बांधकर करते थे अध्ययन : आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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# ज्ञान की ऐसी ललक कि नींद पर भी पा लिया विजय, चोटी को खूंटे से बांधकर करते थे अध्ययन : आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

**मुनिश्री 108 क्षमासागर जी महाराज की पुस्तक ‘अमूर्त शिल्पी’ में वर्णित संस्मरण उजागर करता है आचार्य श्री की असाधारण अध्ययन साधना, गुरु के प्रति समर्पण और ज्ञान को जीवन में उतारने की प्रेरणा**

ज्ञान प्राप्त करने की ललक जब जीवन का संकल्प बन जाती है, तब कठिन से कठिन परिस्थितियां भी मार्ग की बाधा नहीं बन पातीं। साधना, अनुशासन और समर्पण की ऐसी ही प्रेरणादायी झलक आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के जीवन से जुड़े एक संस्मरण में देखने को मिलती है। यह संस्मरण मुनिश्री 108 क्षमासागर जी महाराज द्वारा लिखित पुस्तक *‘अमूर्त शिल्पी’* में वर्णित है। इसमें आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की अध्ययन के प्रति अद्भुत ललक, अपने गुरु आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज के प्रति समर्पण और ज्ञान को आचरण में उतारने की महत्ता का भावपूर्ण चित्रण मिलता है।

 

 

## अध्ययन के प्रति ऐसी लगन, जो नींद से भी बड़ी थी

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को उनके गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज अध्ययन कराते थे। आचार्य श्री अपने जीवन से जुड़े प्रसंग सुनाते हुए बताते थे कि गुरुजी का अध्ययन कराने का तरीका भी अनुशासन और अभ्यास पर आधारित था। जब तक पहले पढ़ाया गया पाठ अच्छी तरह याद नहीं हो जाता, तब तक आगे का पाठ नहीं पढ़ाया जाता था। गुरुजी का स्पष्ट निर्देश रहता था कि पहले पुराने पाठ का भली-भांति अभ्यास करो, फिर आगे बढ़ो।

इस अनुशासन को आत्मसात करने के लिए आचार्य श्री ब्रह्मचारी अवस्था में असाधारण परिश्रम करते थे। दिनभर के अध्ययन के बाद वे रात्रि में सबके सामने ऐसा प्रदर्शित करते, मानो सो गए हों। इसके बाद रात लगभग 12 बजे उठकर पुनः अध्ययन में जुट जाते थे।

 

लेकिन रात में पढ़ते समय नींद आने की संभावना भी रहती थी। इससे बचने के लिए वे अपनी ब्रह्मचारी चोटी को सुतली से बांधकर खूंटे से जोड़ देते थे। उद्देश्य यह था कि यदि अध्ययन करते समय नींद आ जाए और सिर झुके, तो चोटी में खिंचाव होने से उन्हें झटका लगे और उनकी नींद खुल जाए।

 

आचार्य श्री इस प्रसंग को हंसी-मजाक के साथ सुनाते थे। उनके इस संस्मरण में सहज हास्य के साथ ज्ञान के प्रति अद्भुत समर्पण भी झलकता है। यह केवल देर रात तक पढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि उस दृढ़ संकल्प का उदाहरण है, जिसमें ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा आराम और आलस्य पर भारी पड़ जाती है।

 

## गुरु भी ऐसे कि बिना ग्रंथ हाथ में लिए कराते थे अध्ययन

एक ओर शिष्य की ज्ञान प्राप्त करने के प्रति ऐसी तीव्र उत्सुकता थी, तो दूसरी ओर गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का भी ज्ञान और अध्यापन असाधारण था। वे बिना ग्रंथ हाथ में लिए भी कठिन शास्त्रों का अध्ययन कराते थे।

 

 

मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज ने अपने संस्मरण में *‘अष्टसहस्री’* जैसे अत्यंत कठिन जैन न्याय ग्रंथ का उल्लेख किया है। यह ग्रंथ गहन दार्शनिक और तार्किक विषयवस्तु के कारण अत्यंत दुरूह माना जाता है। संस्मरण के अनुसार, आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज इस ग्रंथ का संस्कृत में ही आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को अध्ययन कराते थे, वह भी बिना ग्रंथ सामने रखे।

 

लगभग पांच वर्षों तक गुरु के सान्निध्य में हुए अध्ययन के बाद आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज ने उन्हें मोक्षमार्ग के लिए उपयोगी ज्ञान प्रदान करने की बात कही। साथ ही एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया कि इस ज्ञान का उपयोग संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने वालों के कल्याण के लिए करना। ज्ञान केवल संग्रह करने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसे जीवन की दिशा और साधना का आधार बनाना चाहिए।

 

 

गुरु के इस संदेश में ज्ञान के साथ विवेक, संयम और पात्रता का महत्व भी निहित था। सच्चा ज्ञान वही है, जो मनुष्य को उसके लक्ष्य के निकट ले जाए और उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बने।

 

 

## ज्ञान की सार्थकता तभी, जब वह जीवन में उतरे

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज अपने गुरु से प्राप्त इस शिक्षा को आगे भी अत्यंत महत्व देते थे। वे लोगों को समझाते थे कि केवल ज्ञानवान होना पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति स्वयं व्रत, नियम और संयम को अपने जीवन में स्थान नहीं देता, तो उसके ज्ञान की वास्तविक सार्थकता अधूरी रह जाती है।

 

 

जो ज्ञान स्वयं के जीवन को बदलने में सहायक नहीं बना, जो विचार अपने आचरण में परिवर्तन नहीं ला सके, वे दूसरों के जीवन को बदलने में कितने उपयोगी सिद्ध होंगे? यह प्रश्न प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है।

 

 

ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य केवल शास्त्रों को पढ़ लेना, कठिन विषयों को याद कर लेना या दूसरों को उपदेश देना नहीं है। उसकी सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब वह हमारे विचारों को निर्मल करे, व्यवहार को संयमित बनाए और जीवन को सही दिशा प्रदान करे।

 

 

आचार्य श्री के जीवन से जुड़ा यह संस्मरण बताता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए परिश्रम, अनुशासन और गुरु के प्रति समर्पण आवश्यक हैं, लेकिन ज्ञान की पूर्णता उसके सदुपयोग और आचरण में है।

## आचार्य श्री के जीवन से मिलने वाली प्रेरणा

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की अध्ययन साधना हमें सिखाती है कि लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चय हो तो सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ा जा सकता है। गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का मार्गदर्शन बताता है कि सच्चा गुरु केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि उस ज्ञान के उचित उपयोग की दिशा भी दिखाता है।

वहीं मुनिश्री 108 क्षमासागर जी महाराज द्वारा पुस्तक *‘अमूर्त शिल्पी’* में प्रस्तुत यह संस्मरण हमें याद दिलाता है कि ज्ञान की ऊंचाई तभी सार्थक है, जब उसके साथ विनय, संयम और सदाचार भी जुड़े हों।

**अध्ययन मनुष्य को ज्ञानवान बनाता है, गुरु का मार्गदर्शन उसे सही दिशा देता है और आचरण उस ज्ञान को सार्थक बनाता है। यही इस प्रेरणादायी संस्मरण का मूल संदेश है।**

**संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी**
**मोबाइल : 9929747312**

 

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