कर्मबंध के साथ जन्म मरण का यह चक्र निरंतर चलता रहता है”- मुनि श्री प्रमाण सागर

धर्म

“कर्मबंध के साथ जन्म मरण का यह चक्र निरंतर चलता रहता है”- मुनि श्री प्रमाण सागर

भोपाल (अवधपुरी)

“सांसारिक प्राणियो में शुभ अशुभ परिणाम निरंतर चलते रहते है,उन राग द्वैष रूपी परिणामों से ही कर्म बंध होता है,तथा यह जीव एक गति से दूसरी गति में आता जाता बना रहता है,और जन्म मरण का यह चक्र निरंतर चलता रहता है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के दूसरे दिवस सिद्ध प्रभु की आराधना करते हुये व्यक्त किये उन्होंने कहा कि हम लोग उन सिद्ध परमात्मा की आराधना कर रहे है,जिन्होंने इस संसार चक्र को भेदकर अपना स्थान सिद्धचक्र में बनाया उन्होंने प्रश्न किया कि चार गति और 84 लाख योनि वाले इस संसार में हमने क्या नहीं किया? इसीलिए यह जन्म मरण का यह चक्र चलता चला आ रहा है,और ऐसा ही हाल रहा तो निरंतर चलता ही रहेगा उन्होंने पूछा कि क्या कभी आपकी इच्छा इस कर्मचक्र को भेदने की नहीं होती? जिन सिद्ध परमात्मा की हम आज आराधना कर रहे है,उन्होंने भी कभी इस प्रकार से श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान किया होगा वह धर्मचक्र की शरण में आये और उनका उत्थान हुआ उन्होंने कहा कि धर्मचक्र को अपनाये विना कर्म चक्र को भेदना असंभव है।

 

 

 

 

 

मुनि श्री ने कहा कि आज भगवान ने हमें प्रातः कहा कि मोक्ष की एक वेकेंसी खाली है बोलो कौन कौन आना चाहता है? उन्होंने कहा कि केवल हाथ उठाने से सिद्ध चक्र में अपना स्थान नहीं बना सकते इसके लिये संसार से विरक्ति के भाव उठना चाहिये तभी आपका हाथ उठाना सार्थक हो सकता है। उन्होंने कहा कि हम बात भले ही मोक्ष जाने की करते है,लेकिन अनुराग अभी संसार में ही लगा हुआ है,यह अनादि के संस्कार है जो इतनी जल्दी छूटने वाले नहीं,इन्ही संस्कार को जीतने के लिये ही कहा जा रहा है,”भगवान की भक्ती करोगे तो भाव विशुद्धि बढ़ेगी और संसार का आकर्षण घटेगा तथा सम्यक्त्व के अंकुर फूटेंगे उन्होंने कहा कि “मेंने कितना पुण्य कमाया यह किसी को पता नहीं लेकिन मेरा विषयों से कितना अनुराग घटा इसका पता तो हर व्यक्ति को होना चाहिये।

 

 

 

मुनि श्री ने कहा कि सिद्धचक्र विधान में आने के पश्चात भी यदि सांसारिक विषयों की लालसा है,तो आप कभी सिद्ध चक्र मेंअपना स्थान नहीं बना पाओगे, विषयों के प्रति अनाशक्ति का भाव ही आपके संसार को कम करेगा।

 

 

 

 

उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया प्रत्येक मंत्र को नौ नौ बार मुनि श्री के मुखारविंद उच्चारण के बाद चढ़ाया गया । इस प्रकार 16 अर्घ समर्पित किए गये। सोमवार को 32 अर्घ समर्पित किए जाएगे।

 

 

 

 

इसअवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज एवं समस्त क्षुल्लक मंचासीन थे।कार्यक्रम का संचालन विधानाचार्य ब्र. अशोक भैया लिधोरा,ब्र.अभय भैया तथा अमित बास्तू ने किया सांयकाल 6:20 से शंकासमाधान के पश्चात महाआरती का सौभाग्य विद्याप्रमाण गुरुकुलम् के महामंत्री अनुभव सराफ परिवार को प्राप्त हुआ।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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