*दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति ही आत्मकल्याण के मार्ग में बाधा : आचार्य श्री सुनील सागरजी*
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर।
संसार में मनुष्य के भटकने का एक प्रमुख कारण उसकी दृष्टि का स्वयं के भीतर न जाकर दूसरों की कमियों पर केंद्रित रहना है। साजिशें रचना और शिकायतें करना मानो संसार में जीने का एक तरीका बन गया है। साजिशें रचने वाले और शिकायतें करने वाले प्रायः बाहरी यात्रा में ही उलझे रहते हैं, जबकि वास्तविक आवश्यकता भीतर की यात्रा करने और स्वयं के दोषों को पहचानने की है।
दूसरों को नीचा दिखाना, उन्हें कमतर साबित करना और उनकी कमियों को उजागर करना मनुष्य की सबसे बड़ी भूलों में से एक है। जबकि सत्य यह है कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता विद्यमान है। आवश्यकता केवल उस अंतर्निहित शक्ति को पहचानने, आत्मचिंतन करने और स्वयं को बेहतर बनाने की है। जब मनुष्य दूसरों को बदलने के बजाय स्वयं के भीतर परिवर्तन लाने का प्रयास करेगा, तभी उसके जीवन में आत्मकल्याण और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा।
माही जैन धीरावत पीपलखूंट प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
